Thursday, June 20, 2024

नर नारी के बीच महान सदभावना

*नर नारी के बीच महान सद्भाभावना "पुरुष" विष्णु है-"स्त्री" लक्ष्मी, "पुरुष" विचार है-"स्त्री" भाषा, "पुरुष" धर्म है- "स्त्री" बुद्धि, "पुरुष" तर्क है-"स्त्री" रचना, "पुरुष" धैर्य है-"स्त्री" शांति, "पुरुष" प्रयत्न है-"स्त्री" इच्छा, "पुरुष" दया है-"स्त्री" दान, "पुरुष" मंत्र है-"स्त्री" उच्चारण, "पुरुष" अग्रि है-"स्त्री" ईंधन, "पुरुष" समुद्र है-"स्त्री" किनारा, "पुरुष" धनी है-"स्त्री" धन, "पुरुष" युद्ध है- "स्त्री" शांति, "पुरुष" दीपक है-"स्त्री" प्रकाश, "पुरुष" दिन है-"स्त्री" रात्रि, "पुरुष" वृक्ष है-"स्त्री" फल, "पुरुष" संगीत है-"स्त्री" स्वर, "पुरुष" न्याय है-"स्त्री" सत्य, "पुरुष" सागर है-"स्त्री" नदी, "पुरुष" दंड है-"स्त्री" पताका, "पुरुष" शक्ति है-"स्त्री" सौंदर्य, "पुरुष"आत्मा है-"स्त्री" शरीर ।"*

        *उक्त भावों के साथ ही "विष्णु पुराण" में यह बताया गया है कि पुरुष और स्त्री की अपने-अपने स्थान पर महत्ता, एक दूसरे के अस्तित्व की स्थिति, एक से दूसरे की शोभा आदि संभव है। एक के अभाव में दूसरा कोई महत्व नहीं रखता।*

      *अपूर्णता में मात्र असंतोष ही बना रहेगा और विग्रह ही खड़ा रहेगा। "संतोष" और "सौजन्य" का समन्वय होने से ही प्रगति का रथ आगे बढ़ता है। "नर" और "नारी" के बीच घनिष्ठ स‌द्भाव और सहकार हर दृष्टि से आवश्यक है, पर वह एकांगी नहीं हो सकता। "नर" के प्रति "नारी" से जितनी उदार और मृदुल होने की अपेक्षा की जाती है ठीक उसी के अनुरूप "नारी" के प्रति "नर" को भी बनना पड़ेगा। विशृंखलता "नारी" ने नहीं, "नर" ने उत्पन्न की है। इसलिए उदार सहयोग के सृजन में उसे ही अपनी स‌द्भावनाओं का परिचय देने के लिए आगे आना पड़ेगा।*

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