Monday, April 29, 2024

समाज विशेष का अनुशासन और बच्चों में संस्कारों का विकास

समाज विशेष का अनुशासन और बच्चों में संस्कारों का विकास समाज में अनुशासन और संस्कार दो ऐसे तत्व हैं जो एक स्वस्थ और सभ्य समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। अनुशासन हमें जीवन में व्यवस्था और संयम बनाए रखने में मदद करता है, जबकि संस्कार हमें मूल्यों और नैतिकता के प्रति सजग बनाते हैं। आइए देखें कि समाज विशेष का अनुशासन कैसे होना चाहिए और हम अपने बच्चों को कैसा माहौल दे सकते हैं जिससे वे संस्कारित बनें।

समाज में अनुशासन का महत्व-
समय पालन : समाज में समय का महत्व अधिक होता है। समय पालन सीखने से व्यक्ति अपने काम को समय पर पूरा करता है और यह अन्य लोगों के प्रति भी सम्मान दर्शाता है।-
 आपसी सम्मान : समाज में हर व्यक्ति का आपसी सम्मान अनुशासन का एक अहम हिस्सा है। यह व्यक्ति को सहिष्णु और सहयोगी बनाता है।-

 नियमों का पालन : समाज में बनाए गए नियमों का पालन करने से अनुशासन आता है और यह कानूनी और सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करता है।

बच्चों को संस्कारित बनाने के लिए माहौल- 
आदर्श प्रस्तुत करना : बच्चे अपने माता-पिता और अभिभावकों को देखकर सीखते हैं। इसलिए, उनके सामने अच्छे आदर्श प्रस्तुत करना जरूरी है।-
 संवाद : बच्चों के साथ खुलकर और ईमानदारी से बातचीत करने से उनमें विश्वास और समझ विकसित होती है।- 
शिक्षा का मूल्य : बच्चों को नैतिकता, सच्चाई, करुणा जैसे मूल्यों की शिक्षा देना उन्हें संस्कारित बनाने के लिए आवश्यक है।- 
सामाजिक भागीदारी : बच्चों को सामाजिक गतिविधियों और सेवा में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना, जैसे कि स्वयंसेवा, समुदाय में सहायता करना आदि।-

 *प्राकृतिक और सांस्कृतिक संपर्क : बच्चों को प्रकृति और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना उनमें गहरी जड़ें और सम्मान की भावना विकसित करता है।

एक समाज विशेष का अनुशासन और बच्चों में संस्कारों का विकास इन दोनों की बुनियादी शिक्षाओं पर निर्भर करता है। जब हम अपने बच्चों को सही दिशा में मार्गदर्शन करते हैं और उन्हें सद्गुणों के महत्व को समझाते हैं, तो हम एक संस्कारित और अनुशासित समाज की नींव रखते हैं। इस प्रक्रिया में, हम न केवल अपने बच्चों के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए एक बेहतर भविष्य का निर्माण करते हैं।

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Thursday, April 4, 2024

समाज का ऋण कैसे चुकाएं

समाज का ऋण कैसे चुकाएं.....एक मनुष्य पर समाज का कितना ऋण है, यह सही-सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता। कुछेक बातों के लिए ही हम विचार करें तो पता चलेगा कि समाज का यह ऋण भी इतना भारी है कि उसे चुकाने के लिए कितने ही जन्म लेने पड़ेंगे ? जो भोजन हम खाते हैं, जो वस्त्र हम पहनते हैं, जो पुस्तकें हम पढ़ते हैं तथा नित्यप्रति के जीवन में जिन वस्तुओं का उपयोग हम करते हैं, उसमें कितने ही मनुष्यों का श्रम व सहयोग लगा हुआ है। एक माचिस की डिब्बी पचास पैसे में मिलती है, जिससे पचास बार आग जलाई जा सकती है। पचास पैसे कमाने में मुश्किल से पाँच या दस मिनट लगते होंगे, लेकिन वही डिब्बी हम पूरा दिन लगाकर भी नहीं बना सकते। विचार किया जाना चाहिए कि एक माचिस की डिबिया के लिए ही हम समाज के कितने ऋणी हैं ? मनुष्य ने विभिन्न क्षेत्रों में जो प्रगति की है, जो असाधारण लाभ उठाये हैं तथा जिनके बल पर मनुष्य सृष्टि का मुकुटमणि बना हुआ है, वह समाज का ही अनुदान है। निजी पुरुषार्थ तो उन उपलब्धियों में नगण्य ही समझा जाना चाहिए।
     जिस समाज का इतना उपकार और अनुदान लेकर मनुष्य सुख-सुविधाएँ प्राप्त करता है, उसका वह ऋणी है। इस ऋण को चुकाना कृतज्ञता की, प्रत्युपकार की और सामाजिक श्रृंखला की परंपरा बनाये रखने की दृष्टि से नितांत आवश्यक है। यदि लोग समाज के कोष से लेते तो रहें, पर उसका भंडार भरने की बात न सोचें, तो वह सामूहिक कोष खाली हो जायगा। समाज खोखला और दुर्बल हो जाएगा, उसमें व्यक्तियों की सुविधा बढ़ाने एवं सहायता करने की क्षमता न रहेगी, फलतः मानवीय प्रगति का पथ अवरुद्ध हो जायगा। "प्राप्त तो करें पर लौटायें नहीं" की नीति अपना ली जाए तो बैंक दिवालिये हो जायेंगे, सरकार खोखली हो जायगी, जमीन का उपार्जन बंद हो जायेगा, व्यापार की श्रृंखला ही बिगड़ जायेगी। इस संसार में 'लो और दो' की नीति पर सारी व्यवस्था चल रही है। 'लो' के लिए तैयार- 'दो' के लिए इनकार की परंपरा यदि चल पड़े तो सारा क्रम ही उलट जायगा, तब हमें असामाजिक आदिम युग की ओर वापस लौटना पड़ेगा।
    आधा भाग मनुष्य की बुद्धि और श्रमशीलता का और आधा भाग सामाजिक अनुदान का माना गया है। तदनुसार तत्त्वदर्शियों ने यह व्यवस्था बनाई है कि उसे अपनी जीवन संपदा का आधा भाग अपनी शरीर यात्रा के लिए रखना चाहिए और आधा सामाजिक उत्कर्ष के लिए लगा देना चाहिए। दूसरे शब्दों में इसे "सेवा धर्म" की प्रेरणा भी कहा जा सकता है। मनुष्य को ईश्वर ने इतनी विभूतियाँ दीं, इतने विशेष अधिकार दिये, उनके साथ जुड़े हुए दायित्वों की पूर्ति"सेवा धर्म" अंगीकार करने से ही संभव है। समाज का जो इतना भारी ऋण उसके ऊपर है, उससे आंशिक मुक्ति "सेवा धर्म"अपनाने से प्राप्त की जा सकती है।

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समय का चक्र और संघर्ष की कहानी

जनयुग के प्रहरी में आप पढ़े 😊 समय का चक्र और अज्ञातवास की कहानी, संघर्ष की कहानी  समय का पहिया घूमता रहता है, और हमें अपने जीवन में कई बार ...