Sunday, July 9, 2023

आदर्श विद्यार्थी का जीवन

              


आदर्श विद्यार्थी का जीवन तप एवं साधना का जीवन होता है जो दुनिया के सभी भटकाव से अपने आप को दूर रखता है विद्यार्थी काल जीवन अपने भावी जीवन को मजबूत नीव प्रदान करने का सुनहरा अवसर होता है जहां चरित्र निर्माण निर्धारित होता है यह जीवन अपने ज्ञान को सुदृढ़ बनाने का एक महत्वपूर्ण समय है विद्यार्थी जीवन लगभग 5 वर्ष की आयु से आरंभ हो जाता है इस उम्र से ज्ञान अर्जित करने की तीव्र इच्छाए पनपने लगती है उसे घर की दुनिया से अलग नए शिक्षक नया वातावरण नए सहपाठी मिलते हैं इस उम्र में यह समझ आने लगता है कि समाज क्या है और समाज में किस तरह रहना चाहिए किताबों से लगाव लगने लग जाता है हर नई चीज को अर्जन करने की तीव्र इच्छा होने लगती है ऐसी स्थिति में जब विद्यार्थी विनम्र होकर गुरु से विद्या दान पाता है तो उसके सारे रास्ते आसान हो जाते हैं इस दौरान विद्यार्थी को नीति का ज्ञान, समाज का ज्ञान, विज्ञान की जानकारी, गणित की समझ बड़ी आसानी से समझ आने लगती है भाषा का ज्ञान और विचारों को अभिव्यक्त करने का समय विद्यार्थी जीवन में पूर्णतया प्राप्त करता हुआ आगे बढ़ता है विद्यार्थी जीवन आदर्श विद्यार्थी के रूप में अध्ययन शिल होता है तो उसका जीवन सुख-दुख, लाभ-हानि , गर्मी-सर्दी से परे नित्य अध्ययन शिल होता हुआ। धैर्य,लगन , साहस , ईमानदारी गुरु-भक्ति स्वाभिमान जैसे गुणों को धारण करता है तो संयमित व अनुशासित पथ पर आगे बढ़ता रहता है विद्या का प्रकाश केवल गुरुजनों एवं पुस्तकों से ही नहीं मिलता अपितु आत्मसात करने से झरने की तरह प्रभावित होता ही रहता है इस दौरान खेलकूद, घूमने- फिरने, एक-दूसरे से बातचीत करने, परिवारजन, अन्य मित्रों रिश्तेदारों से बातचीत करने तथा कई प्रकार से बिखरे ज्ञान को संग्रहित करने का समय होता है।जैसे गुण-अवगुण, अच्छा-बुरा, धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप, अपना- पराया, इन सब चीजों की पहचान विद्यार्थी जीवन में होती है यह जीवन का वह महत्वपूर्ण समय होता है जिसमें हम अच्छाई को ग्रहण कर भले-बुरे का भान पाकर बुजुर्गों का सम्मान करते हुये मधुर वाणी का महत्व समझते हुए शारीरिक व मानसिक स्वच्छता पर सिर्फ और सिर्फ अच्छाइयों को ग्रहण करना चाहिए। यह सब सीख का सीखने का समय विद्यार्थी जीवन के आरंभ काल से ध्यान दिया जाये तो सदैव सफलता की ओर अग्रसर होता है विद्यार्थी जीवन ऊँच-नीच, छोटा- बड़ा, अमीर-गरीब, इन सब से कोसों दूर का जीवन होता है विद्यार्थी जीवन मानव जीवन की आधारशिला होती है सांसारिक दायित्वों से मुक्त होता है हर विद्यार्थी के माता-पिता अपनी संतान से वह बड़ी उम्मीद रखते हैं कि उनकी संतानें बड़ी होकर उनका नाम ऊंचा करें इसके लिए सदैव माता-पिता कई परेशानियों का सामना करते हुए विद्यार्थियों का खर्च उठाते हैं और हर गुरुजनों का विद्यार्थियों के प्रति यह प्रयत्न रहता है कि मेरा शिष्य मेरे से आगे बढ़े। हर विद्यालय का संस्था प्रधान यह चाहता है कि मेरा विद्यालय के पढ़ने वाले विद्यार्थी विद्यालय का नाम करें। इसके चलते विद्यार्थियों को भी उन सब की उम्मीदों पर खरा उतरना चाहिए। विद्यार्थी का पहला गुरु मां होती है फिर अपने गुरुजन हमारा परिवार, हमारा समाज, हमारे मित्र, रिश्तेदार इन सबसे मिलकर विद्यार्थियों में संस्कारों का समावेश होता है वो ही संस्कार विद्यार्थी को आगे बढ़ाने अपनी सक्षमता प्रदान करने आत्मा विकास करने, अपनी उर्जा का संचार करने की दक्षता प्रदान करता है। कुसंगतियों के चक्रव्यूह से दूर रहकर ही विद्यार्थी अपने लक्ष्य की प्राप्ति की ओर सदैव अग्रसर होते हैं। खेल-कूद,व्यायाम, हमारा खान-पान, शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना यह सब हमारी मानसिक चेतना के विकास में अहम भूमिका निभाता है अभिभावकों को भी अपने बच्चों को सामाजिक समन्वयता पर विद्यार्थी जीवन में समय-समय पर उसके व्यक्तित्व विकास हेतु सहभागी बनाना चाहिये क्योंकि विद्यार्थी जीवन में व्यक्तित्व का निर्माण प्रारंभ होता है इस दौरान गुण तथा अवगुण का आत्मसात करके उसी के अनुसार उसके चरित्र का निर्माण होता है कोई भी विद्यार्थी अनुशासन के महत्व को समझे बिना अपने लक्ष्य की प्राप्ति की ओर नहीं बढ़ सकता । अनुशासन में रहने वाला विद्यार्थी ही हमेशा कठिन परिश्रमी बनता है और किसी भी बात को नजर अंदाज करने की प्रवृत्ति सामान्य विद्यार्थियों से उन्हें अलग रास्ते पर भटकाती है वर्तमान समय में अनुशासन का स्तर काफी गिर गया है इसका कारण माता-पिता की भाग-दौड़ भरी जिंदगी से अपनी संतान को वांछित समय नहीं दे पाना है जिस कारण बच्चों में अनुशासनहीनता पनपती है जितने भी उच्च पदों पर जैसे IAS, IPS, डॉक्टर, इंजीनियर, IT, IIT, प्रोफेसर शिक्षक जैसे ऊंचे पदों पर आसीन होते हैं उनके जीवन में अनुशासन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है ठीक इसके विपरीत अनुशासनहीनता से कुचक्र में फंस कर अपना जीवन बर्बाद कर देते हैं अतः अनुशासनहीनता को अच्छी शिक्षा, अच्छा वातावरण एवं संस्कार देकर सामूहिक प्रयासों से विद्यार्थियों के भविष्य को संवारा जा सकता है सजाया जा सकता है।

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Thursday, July 6, 2023

संतान के प्रति पिता का भाव

संतान के प्रति पिता का भाव कैसा होना चाहिए यह आधुनिक शिक्षा प्रणाली, युवा पीढ़ी की मानसिकता को विकसित करने में हमने कितनी भूमिका निभाई और संतानों द्वारा किस प्रकार की सोच को समेटे हुए है उन बातो को ध्यान में रखते हुए हमारे कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए उन्हें कभी भी बेलगाम ना छोड़ता और साथ ही सत्यनिष्ठा ,पवित्रता, ईमानदारी ,सच्चरित्रता ,दया ,करुणा ,क्षमा ,विनम्रता ,मैत्री , सेवा ,त्याग आदि मानवीय गुण मनुष्य परिवार में ही सीखता है तो वैसा माहौल भी पिता ही बनाता है, जिस प्रकार एक पौधे की परवरिस के लिए हम उसके चारों ओर पशुओं आदि से बचने के लिए सुरक्षात्मक घेरा लगाते है जिसके बाद वह विशाल वृक्ष बन जाता हैं तब उसे कोई भयंकर आंधी तूफ़ान भी उसको हिला तक नहीं सकता तत्पश्चात वृक्ष छाया, फल ,लकड़ी के माध्यम से कितनो का सहारा बनता है, उसी प्रकार पिता बच्चो के सर्वांगीण विकास के लिए एक मजबूत रक्षा कवच बनता है,पिता का कर्तव्य बहुत व्यापक होता है स्वयं एक महान गुरु होता है साथ ही उसके लिए एक योग्य गुरु निर्धारित करता है, जो उसे शिक्षा देकर सभ्य समाज में जीने लायक बनाता है उसके इर्द गिर्द सपनों का जाल बुनकर स्वर्णिम भविष्य का निर्माण करने वाला पिता ही एक ऐसी शख्शियत हैं इस दुनिया में जो यह चाहेगा कि मेरी संतान मुझसे आगे निकले अतः पिता अपनी संतानों को भविष्य निर्धारण के लिए आवश्यक सामग्री के साथ खुद को प्रवृत्ति में परिवर्तन लाकर संस्कार और व्यवहारिक ज्ञान का प्रारूप एक आदर्श पिता ही तैयार करता है पिता का स्थान आसमान से भी ऊंचा होता हैं।।

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Monday, July 3, 2023

गुरु पूर्णिमा का महत्त्व

गुरु पूर्णिमा का महत्त्व महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास जी के जन्म दिवस के साथ हमारी संस्कृति में एक त्यौहार सा बन गया है, गुरू पूर्णिमा के दिन ही महर्षि वेदव्यास ने वेदों को रचाना की थी, पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव ने सप्तऋषियों को योग विद्या सिखाई थी एवम् परमेश्वर शिव ने ब्रह्मा जी के चार मानस पुत्रों को वेदों का ज्ञान भी दिया था,बौद्ध धर्म को मानने वाले भगवान बुद्ध की याद में मनाते हैं इनकी मान्यता है कि उत्तर प्रदेश के सारनाथ में इस दिन पहला उपदेश दिया था, नेपाल और भूटान में इस पर्व को शिक्षक दिवस के रुप में मनाते हैं हालांकि भारत में 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाया जाता हैं, वेदव्यास जी द्वारा मनुष्य जाति को वेदों का ज्ञान पहली बार उन्होंने ही दिया था, इसलिए सनातन धर्म में महर्षि वेदव्यास जी को प्रथम गुरु का दर्जा प्राप्त है, गुरु हमें प्रबुद्ध करके हमारे अंधकार को दूर कर जीवन प्रकाशित करते हैं, गुरु जीवन को आदर्श विचारो का अनुसरण कराते हैं, मनुष्य जीवन में दिव्यता गुरू से ज्ञानर्जन निष्ठा पूर्वक करने से आती हैं, अतः गुरु हमारे जीवन की आंतरिक शक्ति को जगाते है सत्य और आनंद के दायरे में ले जाते है गुरु पूर्णिमा का महत्त्व हमारे गुरूओ ने हमारे जीवन को गढ़ने का काम किया है उनके सम्मान में यह पावन पर्व मनाया जाता हैं, मनुष्य जीवन में गुरुओं की अहम भूमिका होती हैं तो उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए हिंदू परम्परा में आषाढ़ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को यह पर्व मनाया जाता हैं।।

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समय का चक्र और संघर्ष की कहानी

जनयुग के प्रहरी में आप पढ़े 😊 समय का चक्र और अज्ञातवास की कहानी, संघर्ष की कहानी  समय का पहिया घूमता रहता है, और हमें अपने जीवन में कई बार ...