मैं बाप हूँ, मैंने ख़्वाब बेचे हैं…
मैं बाप हूँ, मैंने ख़्वाब बेचे हैं,
अपने अरमानों को हर रोज़ कुचले हैं।
कभी धूप में खुद जलता रहा,
ताकि मेरे बच्चे छाँव में पले हैं।
मेरी नींदें गिरवी रहीं बरसों तक,
मेरे सपने ज़िम्मेदारियों में ढले हैं।
जो मुस्कान उनके चेहरे पर आई,
उस एक हँसी पर मैंने सौ दर्द सहे हैं।
मेरे हिस्से में थकान और चुप्पी आई,
उनके हिस्से में उजाले भरे कल आए।
मैंने अपने “आज” से समझौता किया,
ताकि उनके “कल” कभी रोए नहीं।
मुझे नाम और शोहरत की चाह न थी,
बस इतना कि मेरा बच्चा हार न माने।
अगर ज़रूरत पड़ी तो फिर बेच दूँ ख़्वाब,
बाप हूँ… सौ बार ये सौदा निभाने।
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