Saturday, December 21, 2024

खुशहाल जीवन के लिए धैर्य रखना चाहिए

खुशहाल जीवन के लिए धैर्य रखना चाहिए। धैर्य एक ऐसा गुण है जो हमें जीवन की चुनौतियों का सामना करने में मदद करती है। जब हम धैर्य रखते हैं, तो हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास कर सकते हैं।

जीवन में हमें कई उतार-चढ़ाव देखने पड़ते हैं। कभी हमें खुशी मिलती है, तो कभी दुख। लेकिन जब हम धैर्य रखते हैं, तो हम उन उतार-चढ़ाव को स्वीकार कर सकते हैं और उन पर विजय पा कर सकते हैं।

धैर्य रखने से हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास कर सकते हैं। जब हम धैर्य रखते हैं, तो हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक कदम उठा सकते हैं। हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक समय और ऊर्जा का निवेश कर सकते हैं और हम अपने जीवन में स्थिरता और संतुलन प्राप्त कर सकते हैं। अपने संबंधों में सुधार कर सकते हैं। जब हम धैर्य रखते हैं,तो अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं।
इसलिए, मनुष्य को खुशहाल जीवन के लिए धैर्य रखना चाहिए। धैर्य रखने से हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास कर सकते हैं, अपने जीवन में स्थिरता और संतुलन प्राप्त कर सकते हैं।

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Monday, December 2, 2024

बेहतर समाज का निर्माण कैसे होगा

बेहतर समाज का निर्माण कैसे होगा जब मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या है "मेरे-तेरे" की भावना समाप्त नहीं होंगी, यह भावना हमें एक दूसरों से अलग करती है और हमें अपने स्वार्थ में लीन कर देती है। हमें अपने हृदय को इस भावना से मुक्त करना होगा और दूसरों के प्रति संवेदनशील बनना होगा।

इसके लिए हमें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना होगा: मानसिक परिवर्तन, व्यावहारिक परिवर्तन और समाजिक परिवर्तन। हमें अपने हृदय को दूसरों के प्रति संवेदनशील बनाना होगा, दूसरों की भावनाओं को समझना होगा और अपने स्वार्थ को दूसरों के हित में रखना सीखना होगा।

हमें दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना होगा, अपने संसाधनों को दूसरों के साथ बांटने के लिए तैयार रहना होगा और दूसरों की समस्याओं को अपनी समस्या समझना होगा। हमें समाज में दूसरों के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ावा देना होगा, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना होगा और समाज में शांति और एकता को बढ़ावा देना होगा।

हमें अपने आप को दूसरों के प्रति संवेदनशील बनाना होगा, अपने विचारों और भावनाओं को दूसरों के साथ बांटना सीखना होगा और अपने जीवन में दूसरों के लिए समय निकालना होगा। इन परिवर्तनों को अपनाकर हम अपने हृदय को दूसरों के प्रति संवेदनशील बना सकते हैं और एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।

हमें यह समझना होगा कि हमारी संवेदनशीलता से हम दूसरों के दिल और दिमाग को जोड़ सकते हैं। हमें अपने हृदय को दूसरों के लिए खोलना होगा और उनकी भावनाओं को समझना होगा। हमें दूसरों के साथ सहयोग करना होगा और उनकी समस्याओं को अपनी समस्या समझना होगा।

हमें यह भी समझना होगा कि हमारी संवेदनशीलता से हम एक दूसरे के साथ जुड़ सकते हैं और एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं। हमें अपने हृदय को दूसरों के प्रति संवेदनशील बनाना होगा और उनकी भावनाओं को समझना होगा। हमें दूसरों के साथ सहयोग करना होगा और उनकी समस्याओं को अपनी समस्या समझना होगा।

इन परिवर्तनों को अपनाकर हम अपने हृदय को दूसरों के प्रति संवेदनशील बना सकते हैं और एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं। हमें यह समझना होगा कि हमारी संवेदनशीलता से हम दूसरों के दिल और दिमाग को जोड़ सकते हैं और एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।

इसलिए, हमें अपने हृदय को दूसरों के प्रति संवेदनशील बनाना होगा और उनकी भावनाओं को समझना होगा। हमें दूसरों के साथ सहयोग करना होगा और उनकी समस्याओं को अपनी समस्या समझना होगा। इन परिवर्तनों को अपनाकर हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।
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Sunday, November 24, 2024

मनुष्य को चाहिए कि वह परिस्थितियों से लड़े

मनुष्य को चाहिए कि वह परिस्थितियों से लड़े, एक स्वप्न टूटे तो दूसरा गढ़े। जिंदगी परिवर्तनों से ही बनी है। किसी भी परिवर्तन से घबराएं नहीं बल्कि उसे स्वीकार करें, कुछ परिवर्तन हमें सफलता दिलाएंगे तो कुछ सफल होने के गुण सिखाएगें। अगर हमने खुद को समझना और समझाना सीख लिया तो हम संसार पर विजय पा सकते हैं। हम जीवन का आनंद ले सकते है क्योंकि हमारे शब्दकोष में केवल एक ही शब्द होना चाहिए 'पर्याप्त', और अधिक हमारे लिए प्रतिकूल शब्द है।

जीवन में हमें कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन हमें उनसे घबराने की बजाय सीखना और आगे बढ़ना चाहिए। हमें अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रयास करना चाहिए, और अगर हमारे सपने टूट जाते हैं तो हमें दूसरा सपना गढ़ना चाहिए।

जिंदगी परिवर्तनों से ही बनी है, और हमें इन परिवर्तनों को स्वीकार करना चाहिए। हमें किसी भी परिवर्तन से घबराने की बजाय उसे स्वीकार करना चाहिए, और उसे अपने जीवन में शामिल करना चाहिए। कुछ परिवर्तन हमें सफलता दिलाएंगे तो कुछ सफल होने के गुण सिखाएगें।

अगर हमने खुद को समझना और समझाना सीख लिया तो हम संसार पर विजय पा सकते हैं। हमें अपने बारे में जानना चाहिए, और हमें अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए प्रयास करना चाहिए। हमें अपने जीवन में संतुष्टि और आनंद प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए।

हम जीवन का आनंद ले सकते है क्योंकि हमारे शब्दकोष में केवल एक ही शब्द होना चाहिए 'पर्याप्त', और अधिक हमारे लिए प्रतिकूल शब्द है। हमें अपने जीवन में संतुष्टि और आनंद प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए, और हमें अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए प्रयास करना चाहिए।

जीवन में हमें कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन हमें उनसे घबराने की बजाय सीखना और आगे बढ़ना चाहिए। हमें अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रयास करना चाहिए, और अगर हमारे सपने टूट जाते हैं तो हमें दूसरा सपना गढ़ना चाहिए।

जिंदगी परिवर्तनों से ही बनी है, और हमें इन परिवर्तनों को स्वीकार करना चाहिए। हमें किसी भी परिवर्तन से घबराने की बजाय उसे स्वीकार करना चाहिए, और उसे अपने जीवन में शामिल करना चाहिए। कुछ परिवर्तन हमें सफलता दिलाएंगे तो कुछ सफल होने के गुण सिखाएगें।

अगर हमने खुद को समझना और समझाना सीख लिया तो हम संसार पर विजय पा सकते हैं |

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Sunday, November 10, 2024

जीवन जीने का सही तरीका: विपरीत परिस्थितियों में धैर्य धारण

जीवन जीने का सही तरीका: विपरीत परिस्थितियों में धैर्य धारण

जीवन में हमें कई तरह की कठिनाइयों और अभावों का सामना करना पड़ता है, लेकिन हमें उन्हें पार करने के लिए अपनी शक्तियों का उपयोग करना चाहिए। संसार में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है, जिसे सब सुख हों और किसी बात का अभाव न हो।

विवेकशील व्यक्ति जीवन में उपलब्ध सुख-सुविधाओं का अधिक चिंतन करते हैं, और उन उपलब्धियों पर संतोष प्रकट करते हुए प्रसन्न रहते हैं। थोड़े-से अभाव एवं कष्ट उन्हें वैसे ही कौतूहलवर्धक लगते हैं, जैसे माता अपने सुंदर बालक के माथे पर काजल की बिंदी लगाकर "डिठोना" बना देती है कि कहीं इसे 'नजर' न लग जाय।

इसके विपरीत अनेकों लोग उपलब्ध अनेकों सुख-साधनों को तुच्छ मानते हैं और जो थोड़े-से कष्ट एवं अभाव हैं, उन्हें ही पर्वत तुल्य मानकर अपने आपको भारी विपत्तिग्रस्त अनुभव करते हैं। ऐसे लोग निरंतर असंतुष्ट रहते हैं, अपने सभी संबंधित लोगों पर दोषारोपण करते हैं।

जीवन को शांतिपूर्ण रीति से व्यतीत करने का तरीका यह है, कि हम अपनी कठिनाइयों का मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर न आँकें, वरन उतना ही समझें, जितना कि वे वास्तव में हैं। तो हमारी अनेकों दुश्चिंताएँ आसानी से नष्ट हो सकती हैं।

जीवन में कठिनाइयों का सामना करने के लिए हमें अपनी शक्तियों का उपयोग करना चाहिए। हमें अपनी कठिनाइयों का मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर नहीं आँकना चाहिए, बल्कि हमें उन्हें पार करने के लिए अपनी शक्तियों का उपयोग करना चाहिए।

जीवन को शांतिपूर्ण रीति से व्यतीत करने के लिए हमें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:

१. हमें अपनी कठिनाइयों का मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर नहीं आँकना चाहिए।
२. हमें अपनी शक्तियों का उपयोग करके कठिनाइयों का सामना करना चाहिए।
३. हमें अपने सभी संबंधित लोगों पर दोषारोपण नहीं करना चाहिए।
४. हमें अपनी कठिनाइयों को पार करने के लिए अपनी शक्तियों का उपयोग करना चाहिए।

इन बातों का ध्यान रखकर हम अपने जीवन को शांतिपूर्ण रीति से व्यतीत कर सकते हैं। हमें अपनी कठिनाइयों का सामना करने के लिए अपनी शक्तियों का उपयोग करना चाहिए और हमें अपने जीवन को शांतिपूर्ण रीति से व्यतीत करने के लिए निरंतर प्रयत्न करना चाहिए।

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Saturday, November 2, 2024

रामा सामा का महत्व

भारतीय संस्कृति और हिंदू त्योहारों में रामा सामा एक महत्वपूर्ण परंपरा है, जो दीवाली के दूसरे दिन मनाई जाती है। यह परंपरा राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में विशेष रूप से मनाई जाती है। हिंदू त्योहारों में दीवाली एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। दीवाली के दूसरे दिन रामा सामा की परंपरा मनाई जाती है, जिसमें छोटे व्यक्ति बड़ों के चरण छूते हैं और बड़े आशीर्वाद स्वरूप सगुन में कुछ देते हैं।

भारतीय संस्कृति में रामा सामा का महत्व बहुत अधिक है। यह परंपरा सम्मान, आदर और प्रेम का प्रतीक है। इसमें छोटे व्यक्ति बड़ों के चरण छूते हैं और बड़े आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा पारिवारिक और सामाजिक बंधन को मजबूत करने में मदद करती है। रामा सामा की परंपरा संस्कृति और परंपरा को संरक्षित करने में भी मदद करती है।

हिंदू त्योहारों में रामा सामा का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। यह परंपरा दीवाली के दूसरे दिन मनाई जाती है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। भगवान राम की विजय का जश्न मनाने के लिए यह परंपरा मनाई जाती है। इसमें परिवार और मित्रों के साथ मिलने का अवसर मिलता है।

रामा सामा की विशेषताएं बहुत ही अद्वितीय हैं। इसमें छोटे व्यक्ति बड़ों के चरण छूते हैं और बड़े आशीर्वाद देते हैं। यह परंपरा परिवार और मित्रों के साथ मिलने का अवसर प्रदान करती है। रामा सामा की परंपरा राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में विशेष रूप से मनाई जाती है।

रामा सामा के फायदे बहुत ही अधिक हैं। यह परंपरा सम्मान और आदर की भावना को बढ़ावा देती है। इसमें पारिवारिक और सामाजिक संबंधों में मजबूती आती है। छोटे व्यक्ति बड़ों से सीखते हैं और उनका अनुभव प्राप्त करते हैं। रामा सामा की परंपरा संस्कृति और परंपरा को संरक्षित करने में मदद करती है।

इस प्रकार, रामा सामा भारतीय संस्कृति और हिंदू त्योहारों में एक महत्वपूर्ण परंपरा है। यह परंपरा सम्मान, आदर और प्रेम का प्रतीक है। रामा सामा की परंपरा पारिवारिक और सामाजिक बंधन को मजबूत करने में मदद करती है और संस्कृति और परंपरा को संरक्षित करने में भी मदद करती है।

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Monday, October 21, 2024

कर्म या किस्मत किसकी भूमिका अधिक

कर्म की भूमिका अधिक या किस्मत की यह एक विवादित विषय है कर्म और किस्मत दोनों ही जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हमारे कर्म हमारे जीवन को आकार देते हैं, जबकि किस्मत हमें अप्रत्याशित परिस्थितियों में डालती है। लेकिन अंत में, हमारे कर्म ही हमारी किस्मत को आकार देते हैं, कर्म का अर्थ है हमारे द्वारा किए गए कार्य। यह हमारे विचारों, भावनाओं और क्रियाओं का परिणाम है। हमारे कर्म हमारे जीवन को आकार देते हैं और हमें आगे बढ़ने में मदद करते हैं। यदि हम अच्छे कर्म करते हैं, तो हमें अच्छे परिणाम मिलते हैं, और यदि हम बुरे कर्म करते हैं, तो हमें बुरे परिणाम मिलते हैं, किस्मत का अर्थ है हमारे जीवन में होने वाली घटनाएं जो हमारे नियंत्रण से बाहर होती हैं। यह हमारे जीवन को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किस्मत हमें अप्रत्याशित परिस्थितियों में डालती है, जो हमारे जीवन को बदल सकती हैं, लेकिन कर्म और किस्मत दोनों ही एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। हमारे कर्म हमारी किस्मत को आकार देते हैं। यदि हम अच्छे कर्म करते हैं, तो हमें अच्छी किस्मत मिलती है, और यदि हम बुरे कर्म करते हैं, तो हमें बुरी किस्मत मिलती है, इसलिए, हमें अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए और अच्छे कर्म करने की कोशिश करनी चाहिए। इससे हम अपनी किस्मत को अच्छी बना सकते हैं और अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं,
इसके अलावा, हमें अपनी किस्मत को स्वीकार करना चाहिए और उसे बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हमें अपने जीवन में होने वाली घटनाओं को स्वीकार करना चाहिए और उनसे सीखना चाहिए,अंत में, कर्म और किस्मत दोनों ही जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हमें अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए और अच्छे कर्म करने की कोशिश करनी चाहिए, और अपनी किस्मत को स्वीकार करना चाहिए.... किस्मत का निर्माण आपको कर्मो के आधार पर निर्मित होने के संभावनाएं अधिक रहती हैं अतः कर्म को प्राथमिकता देते रहे 

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Monday, September 30, 2024

किश्मत रुठे पर हिम्मत न टूटे

किश्मत रूठें पर हिम्मत न टूटे: जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति सदैव अपने अंदर रखना चाहिए, जीवन में हमें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कभी-कभी किश्मत हमारे साथ नहीं होती, लेकिन हिम्मत नहीं टूटनी चाहिए। हिम्मत हमारे जीवन की सबसे बड़ी ताकत है। यह हमें चुनौतियों का सामना करने की शक्ति देती है। हिम्मत की शक्ति हमें सकारात्मक सोच रखने में मदद करती है और हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
हिम्मत के बिना, हम चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते। हमें मेहनत और प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। हिम्मत और संघर्ष से चुनौतियों का सामना करना जीवन की चुनौतियों से सीखने की प्रक्रिया स्वतः बनती जाती है, हमें अपने अनुभवों से सीखना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए 
किश्मत रूठें पर हिम्मत न टूटे यह एक प्रेरक विचार है जो हमें जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति देता है। हरपल चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। हमें अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए।
इस विचार को अपनाकर हम जीवन की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं और सफलता प्राप्त कर सकते हैं। हमें अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए। विनोबा भावे ने कहा है कि प्रार्थना और प्रयत्न साथ चलते है, तो हमारे प्रयत्न के साथ हमारे विश्वास की डोर क़ायम रहना चाहिए...
जीवन में चुनौतियों का सामना करना एक आवश्यक हिस्सा है। लेकिन हमें हिम्मत नहीं टूटनी चाहिए। हमें अपनी हिम्मत और संघर्ष से साहस पूर्वक चुनौतियों का सामना करना चाहिए। हमें अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए अथक प्रयास करना चाहिए ताकि किश्मत को भी घुटने टेकना पड़े कि हिम्मत और साहस के साथ मेहनत सफलता की लहर लायेगा।

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Monday, September 16, 2024

सत्य में हजार हाथियों का बल

 सत्य में हजार हाथियों का बल क्योंकि सत्य में हजार हाथियों का बल होता है, "सत्य" की महिमा अपार है। शास्त्रों और ऋषियों ने उसे धर्म और अध्यात्म का आधार माना है और कहा है- "सत्यमेव जयते नानृतम्" अर्थात् "सत्य ही जीतता है, असत्य नहीं।" चिरस्थायी सफलताओं का आधार सत्य पर रखा गया है। असत्य के सहारे कोई व्यक्ति थोड़े समय तक लाभ प्राप्त कर सकता है, पर जब वस्तुस्थिति प्रकट हो जाती है, तब उस लाभ को समाप्त होते हुए भी देर नहीं लगती। "सत्य" का वट वृक्ष धीरे-धीरे भले ही बढ़ता और फैलता-फूलता हो, पर जब वह परिपुष्ट हो जाता है. तब उसका आयुष्य हजारों वर्षों का बन जाता है। वट वृक्ष की जड़ें नीचे जमीन में भी चलती हैं और ऊपर की शाखाओं में से भी निकलकर नीचे आती हैं और जमीन में प्रवेश कर वृक्ष की पुष्टि और आयु बढ़ाने में सहायक होती हैं। दूसरे छोटे पेड़-पौधे प्रकृति के प्रवाह को देर तक नहीं सह पाते और शीघ्र ही बूढ़े होकर अपना अस्तित्व खो बैठते हैं। "सत्य" वट वृक्ष के समान है, अन्य आधारों पर प्राप्त की गई सफलताएँ बरसाती घास-पात की तरह हैं, जो "सत्य" के सूर्य की प्रखरता सहन कर सकने में समर्थ नहीं होती ग्रीष्म ऋतु में उनका अस्तित्व अक्षुण्ण नहीं रह सकता।*
 *उक्ति है कि "सत्य में हजार हाथियों के बराबर बल होता है।" शारीरिक दृष्टि से यह बात सच भले ही न हो, पर आत्मिक दृष्टि से पूर्णतया सही है। "सत्यनिष्ठ" व्यक्ति में इतना "आत्मबल" होता है कि वह अकेला हजार मिथ्याचारियों से भिड़ सकता है और अंततः वही विजय प्राप्त करता है। जहाँ सत्य है, वहाँ अन्य गुण अपने आप उत्पन्न हो जाते हैं। जहाँ असत्य है, वहाँ दुर्गुणों का भंडार धीरे-धीरे भरता और बढ़ता चला जाता है। इसलिए "आत्मबल" बढ़ाने के लिए, ईश्वर प्राप्त करने के लिए हमारे शास्त्रों में "सत्यनिष्ठा" को महानतम उपासना बताया है। भारतीय धर्म में सत्य को परमात्मा का स्वरूप माना है। सत्य को नारायण कहा गया है, "सत्य-नारायण" भगवान् की 'जय बोलने, कथा सुनने, व्रत रखने का अपने यहाँ चिर-प्रचलन है। यह सत्य-नारायण कोई व्यक्ति या देवता नहीं है वरन् सच्चाई को अंतःकरण, मस्तिष्क और व्यवहार में प्रतिष्ठापित करने की प्रगाढ़ आस्था ही है। जो सत्यनिष्ठ है, वही सत्य-नारायण भगवान का समीपवर्ती साधक है। *स्वर्ग और मुक्ति-सिद्धि एवं समृद्धि तो उसके करतलगत ही रहती है।*

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Tuesday, August 27, 2024

संघर्ष के समय जीवन को सकारात्मक रखें

संघर्ष के समय जीवन को सकारात्मक रखने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने विचारों को नियंत्रित करें और नकारात्मकता को दूर रखें। हमें अपने लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और उन्हें प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए। इसके अलावा, हमें अपने परिवार, मित्रों और समाज से सहारा लेना चाहिए और अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। धैर्य और आभार के साथ, हम संघर्षों का सामना करने में सक्षम हो सकते हैं और अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ा सकते हैं।
संघर्ष के समय हमें अपने आप पर विश्वास रखना चाहिए और अपनी क्षमताओं पर भरोसा करना चाहिए। हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कठिन प्रयास करना चाहिए और हार नहीं माननी चाहिए। इसके अलावा, हमें अपने जीवन में अच्छी चीजों के लिए आभार रखना चाहिए और उन्हें महत्व देना चाहिए।
संघर्ष के समय हमें अपने परिवार और मित्रों से सहारा लेना चाहिए और उनके समर्थन से हम संघर्षों का सामना करने में सक्षम हो सकते हैं। हमें अपने समाज से भी जुड़ना चाहिए और उनके साथ मिलकर संघर्षों का सामना करना चाहिए।
इसके अलावा, हमें अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और पर्याप्त नींद से हम संघर्षों का सामना करने में सक्षम हो सकते हैं। हमें तनाव और चिंता को दूर रखना चाहिए और शांति से संघर्षों का सामना करना चाहिए।
अतः संघर्ष के समय जीवन को सकारात्मक रखने के लिए हमें धैर्य और संयम के साथ कठिन प्रयास करना चाहिए। हमें अपने लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और उन्हें प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए। इसके अलावा, हमें अपने परिवार, मित्रों और समाज से सहारा लेना चाहिए और अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए।

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Sunday, August 18, 2024

रक्षा बंधन: भाई-बहन के प्यार का संकल्प पर्व

रक्षा बंधन: भाई-बहन के प्यार का संकल्प पर्व

रक्षा बंधन एक पवित्र पर्व है, जो भाई-बहन के प्यार और स्नेह को दर्शाता है। यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि भाई-बहन का रिश्ता कितना महत्वपूर्ण है और हमें एक दूसरे के प्रति अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का पालन करना चाहिए।

भाई-बहन का रिश्ता एक अनोखा रिश्ता है, जो प्यार, स्नेह और त्याग से भरा होता है। यह रिश्ता हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और हमें एक दूसरे के साथ जोड़ता है।

रक्षा बंधन के दिन, बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। भाई भी अपनी बहनों को उपहार देते हैं और उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं।

यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि भाई-बहन का रिश्ता कितना महत्वपूर्ण है और हमें एक दूसरे के प्रति अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का पालन करना चाहिए। रक्षा बंधन के माध्यम से, हम अपने रिश्तों को मजबूत बना सकते हैं और एक दूसरे के साथ जुड़ सकते हैं।

इसलिए, आइए हम रक्षा बंधन के इस पवित्र पर्व को मनाएं और अपने भाई-बहन के साथ अपने रिश्तों को मजबूत बनाएं।

Monday, July 22, 2024

वार्तालाप में विनयशीलता

वार्तालाप में "विनयशीलता" कमजोरी की निशानी नहीं है। उसके साथ "शालीनता" की परंपरा भी जुडी होती है। वृक्ष जब फलों से लदते है. तो उनकी डालियाँ झुक जाती हैं। अरंड का पेड अकड़ा-तना रहता है. क्योंकि उसे अपनी ऊँचाई भर का ज्ञान होता है,  वह  भूल जाता है कि उसकी डाली से न किसी का पेट भरता है और न उसके नीचे कोई विश्राम कर पाता है। नदियाँ जमीन से गहरी होती है इसलिए उनमें इर्द-गिर्द के अनेक प्रवाह मिलते चले जाते हैं। जो जितना "उथला" होगा वह उतना ही उफन कर चलेगा,गहरी नदियाँ ही दूर-दूर तक का पानी अपनी ओर खींचती और उदरस्थ करती रहती हैं। "सज्जनोचित" "मधुर वाणी" में ऐसा ही चुंबकत्व है, जो अपरिचितों को ही नहीं, विरोधियों को भी अपना बना लेती है। इसके विपरीत कटुभाषी अकारण, अपरिचितों से भी बैर मोल लेता रहता है उनके मित्रों की संख्या निरंतर घटती और शत्रुओं की बढ़ती जाती है। वे इसका दोष यों दूसरों पर ही थोपते हैं, पर यथार्थता यह नही है। भौरे मकरंद पान करते हैं। मधुमक्खियाँ शहद बटोरती हैं। "तितलियाँ" आजीवन कला और सौंदर्य के साथ विचरण करती हैं, जबकि उसी बाग में गुबरीला कीड़ा मात्र सड़े गोबर को खोजता तथा मिलने पर उसी की दुर्गंध में रमता है और उसी स्तर का बनता जाता है। हाट में हर प्रकार की वस्तुएँ बिकती हैं, पर ग्राहक अपनी मर्जी का ही माल खरीदता है। संसार के बाजार में बुरा भी मौजूद है भला भी, पर दुर्बुद्धि को तो मात्र कुरूपता ही दीखती है और वह उसी को कोसते हुए अपनी निकृष्टता उजागर करती रहती है। इस संदर्भ में कौन किस मनःस्थिति में है, इसका परिचय करना हो, तो उसकी वाणी कुछ देर ध्यानपूर्वक सुननी चाहिए। उससे सहज जाना जा सकता है कि किसी उजड्ड से पाला पड़ा या सज्जन के साथ ? अन्य गुण चाहे हो या न हो, पर इस कौशल को सीखा ही जाना चाहिए कि "मधुर" व्यवहार से हर किसी के मन में अपने लिए जगह किस प्रकार बनाई जाए ? स‌द्भाव का इत्र छिड़ककर किस प्रकार संबद्ध वातावरण को सुगंध से महकाया जाए ? "मधुर" वाणी इन सत्प्रयोजनों को सहज ही पूरा करती रहती है।*
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Thursday, June 20, 2024

नर नारी के बीच महान सदभावना

*नर नारी के बीच महान सद्भाभावना "पुरुष" विष्णु है-"स्त्री" लक्ष्मी, "पुरुष" विचार है-"स्त्री" भाषा, "पुरुष" धर्म है- "स्त्री" बुद्धि, "पुरुष" तर्क है-"स्त्री" रचना, "पुरुष" धैर्य है-"स्त्री" शांति, "पुरुष" प्रयत्न है-"स्त्री" इच्छा, "पुरुष" दया है-"स्त्री" दान, "पुरुष" मंत्र है-"स्त्री" उच्चारण, "पुरुष" अग्रि है-"स्त्री" ईंधन, "पुरुष" समुद्र है-"स्त्री" किनारा, "पुरुष" धनी है-"स्त्री" धन, "पुरुष" युद्ध है- "स्त्री" शांति, "पुरुष" दीपक है-"स्त्री" प्रकाश, "पुरुष" दिन है-"स्त्री" रात्रि, "पुरुष" वृक्ष है-"स्त्री" फल, "पुरुष" संगीत है-"स्त्री" स्वर, "पुरुष" न्याय है-"स्त्री" सत्य, "पुरुष" सागर है-"स्त्री" नदी, "पुरुष" दंड है-"स्त्री" पताका, "पुरुष" शक्ति है-"स्त्री" सौंदर्य, "पुरुष"आत्मा है-"स्त्री" शरीर ।"*

        *उक्त भावों के साथ ही "विष्णु पुराण" में यह बताया गया है कि पुरुष और स्त्री की अपने-अपने स्थान पर महत्ता, एक दूसरे के अस्तित्व की स्थिति, एक से दूसरे की शोभा आदि संभव है। एक के अभाव में दूसरा कोई महत्व नहीं रखता।*

      *अपूर्णता में मात्र असंतोष ही बना रहेगा और विग्रह ही खड़ा रहेगा। "संतोष" और "सौजन्य" का समन्वय होने से ही प्रगति का रथ आगे बढ़ता है। "नर" और "नारी" के बीच घनिष्ठ स‌द्भाव और सहकार हर दृष्टि से आवश्यक है, पर वह एकांगी नहीं हो सकता। "नर" के प्रति "नारी" से जितनी उदार और मृदुल होने की अपेक्षा की जाती है ठीक उसी के अनुरूप "नारी" के प्रति "नर" को भी बनना पड़ेगा। विशृंखलता "नारी" ने नहीं, "नर" ने उत्पन्न की है। इसलिए उदार सहयोग के सृजन में उसे ही अपनी स‌द्भावनाओं का परिचय देने के लिए आगे आना पड़ेगा।*

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Sunday, May 26, 2024

गर्मी की तपन और पेड़ो की कमी

गर्मी की तपन और पेड़ों की कमी विश्वभर में पर्यावरणीय समस्याओं के रूप में उभर रही हैं। इन दोनों के परिणामस्वरूप पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य, और जीवन के अन्य क्षेत्रों पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। गर्मी की तपन के कारण जलवायु परिवर्तन की चिंता बढ़ रही है, जो विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं के रूप में प्रकट हो रहा है। साथ ही, पेड़ों की कटाई और वन्यजीवों के लोप की समस्या भी विपणन के अनेक कारणों से बढ़ रही है। इससे न केवल वन्यजीवों का अंत हो रहा है, बल्कि यह प्राकृतिक परिसंपत्तियों को भी हानि पहुंचा रहा है।
गर्मी की तपन के परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन के कारण आज हम बढ़ती हुई तापमान, अस्थिर मौसम और अनियमित वर्षा के साथ जूझ रहे हैं। इससे अनियमित बारिश, सूखा, बाढ़, और तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ रही हैं, जिनका सीधा प्रभाव हमारे जीवन और आजीविका पर पड़ रहा है। इसके साथ ही, बढ़ते जलवायु परिवर्तन के कारण जल संसाधनों की अनियमितता बढ़ रही है, जिससे जल संकट की समस्या भी बढ़ती जा रही है।

पेड़ों की कमी ने हमारे पर्यावरण को अत्यधिक नुकसान पहुंचाया है। वनों की कटाई और अवैध वनस्पति उत्पादन के कारण भूमि का बिना जरुरत के उपयोग हो रहा है, जिससे प्राकृतिक वातावरण और बायोडाइवर्सिटी को बहुत ही बड़ा नुकसान पहुंचा है। पेड़ों की कमी के कारण जल स्रोतों की कमी हो रही है, जो जल संभावनाओं को अत्यधिक नुकसान पहुंचा रही है।

इस संदर्भ में, हमें आपातकालीन कदम उठाने और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करने के लिए पर्यावरण संरक्षण और प्रबंधन में सकारात्मक उपाय अपनाने की आवश्यकता है। वनरोपण, जल संरक्षण, और जन जागरूकता के माध्यम से हमें पर्यावरण को संरक्षित रखने और जीवन को स्थिर बनाने के लिए साझेदारी करनी चाहिए।

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Monday, April 29, 2024

समाज विशेष का अनुशासन और बच्चों में संस्कारों का विकास

समाज विशेष का अनुशासन और बच्चों में संस्कारों का विकास समाज में अनुशासन और संस्कार दो ऐसे तत्व हैं जो एक स्वस्थ और सभ्य समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। अनुशासन हमें जीवन में व्यवस्था और संयम बनाए रखने में मदद करता है, जबकि संस्कार हमें मूल्यों और नैतिकता के प्रति सजग बनाते हैं। आइए देखें कि समाज विशेष का अनुशासन कैसे होना चाहिए और हम अपने बच्चों को कैसा माहौल दे सकते हैं जिससे वे संस्कारित बनें।

समाज में अनुशासन का महत्व-
समय पालन : समाज में समय का महत्व अधिक होता है। समय पालन सीखने से व्यक्ति अपने काम को समय पर पूरा करता है और यह अन्य लोगों के प्रति भी सम्मान दर्शाता है।-
 आपसी सम्मान : समाज में हर व्यक्ति का आपसी सम्मान अनुशासन का एक अहम हिस्सा है। यह व्यक्ति को सहिष्णु और सहयोगी बनाता है।-

 नियमों का पालन : समाज में बनाए गए नियमों का पालन करने से अनुशासन आता है और यह कानूनी और सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करता है।

बच्चों को संस्कारित बनाने के लिए माहौल- 
आदर्श प्रस्तुत करना : बच्चे अपने माता-पिता और अभिभावकों को देखकर सीखते हैं। इसलिए, उनके सामने अच्छे आदर्श प्रस्तुत करना जरूरी है।-
 संवाद : बच्चों के साथ खुलकर और ईमानदारी से बातचीत करने से उनमें विश्वास और समझ विकसित होती है।- 
शिक्षा का मूल्य : बच्चों को नैतिकता, सच्चाई, करुणा जैसे मूल्यों की शिक्षा देना उन्हें संस्कारित बनाने के लिए आवश्यक है।- 
सामाजिक भागीदारी : बच्चों को सामाजिक गतिविधियों और सेवा में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना, जैसे कि स्वयंसेवा, समुदाय में सहायता करना आदि।-

 *प्राकृतिक और सांस्कृतिक संपर्क : बच्चों को प्रकृति और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना उनमें गहरी जड़ें और सम्मान की भावना विकसित करता है।

एक समाज विशेष का अनुशासन और बच्चों में संस्कारों का विकास इन दोनों की बुनियादी शिक्षाओं पर निर्भर करता है। जब हम अपने बच्चों को सही दिशा में मार्गदर्शन करते हैं और उन्हें सद्गुणों के महत्व को समझाते हैं, तो हम एक संस्कारित और अनुशासित समाज की नींव रखते हैं। इस प्रक्रिया में, हम न केवल अपने बच्चों के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए एक बेहतर भविष्य का निर्माण करते हैं।

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Thursday, April 4, 2024

समाज का ऋण कैसे चुकाएं

समाज का ऋण कैसे चुकाएं.....एक मनुष्य पर समाज का कितना ऋण है, यह सही-सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता। कुछेक बातों के लिए ही हम विचार करें तो पता चलेगा कि समाज का यह ऋण भी इतना भारी है कि उसे चुकाने के लिए कितने ही जन्म लेने पड़ेंगे ? जो भोजन हम खाते हैं, जो वस्त्र हम पहनते हैं, जो पुस्तकें हम पढ़ते हैं तथा नित्यप्रति के जीवन में जिन वस्तुओं का उपयोग हम करते हैं, उसमें कितने ही मनुष्यों का श्रम व सहयोग लगा हुआ है। एक माचिस की डिब्बी पचास पैसे में मिलती है, जिससे पचास बार आग जलाई जा सकती है। पचास पैसे कमाने में मुश्किल से पाँच या दस मिनट लगते होंगे, लेकिन वही डिब्बी हम पूरा दिन लगाकर भी नहीं बना सकते। विचार किया जाना चाहिए कि एक माचिस की डिबिया के लिए ही हम समाज के कितने ऋणी हैं ? मनुष्य ने विभिन्न क्षेत्रों में जो प्रगति की है, जो असाधारण लाभ उठाये हैं तथा जिनके बल पर मनुष्य सृष्टि का मुकुटमणि बना हुआ है, वह समाज का ही अनुदान है। निजी पुरुषार्थ तो उन उपलब्धियों में नगण्य ही समझा जाना चाहिए।
     जिस समाज का इतना उपकार और अनुदान लेकर मनुष्य सुख-सुविधाएँ प्राप्त करता है, उसका वह ऋणी है। इस ऋण को चुकाना कृतज्ञता की, प्रत्युपकार की और सामाजिक श्रृंखला की परंपरा बनाये रखने की दृष्टि से नितांत आवश्यक है। यदि लोग समाज के कोष से लेते तो रहें, पर उसका भंडार भरने की बात न सोचें, तो वह सामूहिक कोष खाली हो जायगा। समाज खोखला और दुर्बल हो जाएगा, उसमें व्यक्तियों की सुविधा बढ़ाने एवं सहायता करने की क्षमता न रहेगी, फलतः मानवीय प्रगति का पथ अवरुद्ध हो जायगा। "प्राप्त तो करें पर लौटायें नहीं" की नीति अपना ली जाए तो बैंक दिवालिये हो जायेंगे, सरकार खोखली हो जायगी, जमीन का उपार्जन बंद हो जायेगा, व्यापार की श्रृंखला ही बिगड़ जायेगी। इस संसार में 'लो और दो' की नीति पर सारी व्यवस्था चल रही है। 'लो' के लिए तैयार- 'दो' के लिए इनकार की परंपरा यदि चल पड़े तो सारा क्रम ही उलट जायगा, तब हमें असामाजिक आदिम युग की ओर वापस लौटना पड़ेगा।
    आधा भाग मनुष्य की बुद्धि और श्रमशीलता का और आधा भाग सामाजिक अनुदान का माना गया है। तदनुसार तत्त्वदर्शियों ने यह व्यवस्था बनाई है कि उसे अपनी जीवन संपदा का आधा भाग अपनी शरीर यात्रा के लिए रखना चाहिए और आधा सामाजिक उत्कर्ष के लिए लगा देना चाहिए। दूसरे शब्दों में इसे "सेवा धर्म" की प्रेरणा भी कहा जा सकता है। मनुष्य को ईश्वर ने इतनी विभूतियाँ दीं, इतने विशेष अधिकार दिये, उनके साथ जुड़े हुए दायित्वों की पूर्ति"सेवा धर्म" अंगीकार करने से ही संभव है। समाज का जो इतना भारी ऋण उसके ऊपर है, उससे आंशिक मुक्ति "सेवा धर्म"अपनाने से प्राप्त की जा सकती है।

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Sunday, March 31, 2024

परमात्मा ने मनुष्य को संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनाया है

परमात्मा ने मनुष्य को संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनाया है। काम करने लायक समर्थ शरीर, सोचने-समझने के लिए विचारशील बुद्धि, एक-दूसरे से संपर्क करने तथा अपने भाव और विचार दूसरों तक पहुँचाने के लिए वाणी प्रदान की है। यदि एक-एक विशेषताओं को देखें तो संसार का कोई प्राणी उसकी तुलना का नहीं बैठता। बौद्धिक प्रतिभा के द्वारा मनुष्य ने उन्नत सभ्यता और संस्कृति का निर्माण किया-जबकि अन्य प्राणी भोजन और प्रजनन से आगे नहीं बढ़ सके। उसे जो वाणी मिली है-जिसके द्वारा वह अपने सूक्ष्म से सूक्ष्म भाव भी दूसरों तक संप्रेषित कर सकता है, वैसी क्षमता दूसरे प्राणियों में कहाँ ? ऐसी ही अगणित विशेषताएँ, विभूतियाँ मनुष्य को उपलब्ध है। वह प्रकृति की संपदा का भरपूर उपयोग कर सकता है. दूसरे प्राणियों को वैसी सुविधा नहीं है।
     इतनी विशेषताओं को देखकर लगता है कि परमात्मा ने मनुष्य के साथ पक्षपात किया है। मात्र अधिकारों को ही देखा जाए तो यही धारणा बनती है, लेकिन गहराई से विचार किया जाए तो समझ में आता है कि विशेष अधिकारों के साथ विशेष कर्तव्य भी जुड़े होते हैं। एक बैंक मैनेजर और एक चपरासी को बैंक से मिलने वाली सुविधाओं में जो अंतर है, वह उत्तरदायित्व की गंभीरता और विशेषता के कारण ही है। परमात्मा की ओर से मनुष्य को जो अतिरिक्त अनुदान मिले हैं, वह पक्षपात नहीं है और न ही अन्य जीवों के साथ अंधेर-अन्याय। उसे जो विशेष सुविधाएँ मिली हैं, वे इसलिए कि मनुष्य उनकी सहायता से अधिक काम कर सके। जिस दायित्व की पूर्ति को सरल-साध्य बनाने के लिए मनुष्य को यह सुविधाएँ मिली है, वह दायित्व है-परमात्मा के इस विश्व उद्यान को सुंदर बनाना।
      घर में पिता अपने जवान और समझदार बड़े बेटे को घर की विशेष जिम्मेदारियों सौंपता है, तो उसे दूसरों की अपेक्षा अधिक अधिकार-अनुदान भी देता है। ऐसा करना उचित भी है और आवश्यक भी। परमात्मा ने अन्य जीवों की तुलना में मनुष्य को अपना वरिष्ठ पुत्र मानकर विशेष अनुदान दिये हैं। उद्देश्य यही है कि जब वह अपने विशेष उत्तरदायित्व पूरे करने के लिए आगे आये तो उन्हें संभाल भी सके और पूरा भी कर सके

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Thursday, March 21, 2024

रिश्तों में अपनेपन का महत्त्व

रिश्तों में अपनेपन का महत्व जीवन में आवश्यक होता है जब हम अपने जीवन की यात्रा पर निकलते हैं, तो हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं हमारे आस-पास के लोग। हमारे जीवन में अपनेपन के रिश्ते हमें सहारा देते हैं, हमें आत्मविश्वास प्रदान करते हैं और हमें जीने की प्रेरणा प्रदान करते हैं। इस ब्लॉग में, हम अपनेपन के रिश्तों के महत्व को समझने का प्रयास करेंगे और उनके महत्व को समझेंगे।

अपनेपन के रिश्तों का अर्थ है किसी के साथ वह विशेष संबंध जो हमें वास्तविकता में संपूर्णता का अहसास कराता है। ये रिश्ते हमें उस अहसास से परिचित कराते हैं कि हम कितने महत्वपूर्ण हैं, कितने प्रेमी हैं और कितने समर्पित हैं।
अपनेपन के रिश्ते हमें एक-दूसरे के साथ संबंधों की गहराई में ले जाते हैं और हमें एक-दूसरे की भावनाओं को समझने और साथ ही साथ उन्हें समझाने का अवसर प्रदान करते हैं।
अपनेपन के रिश्तों का एक और महत्वपूर्ण अंग है सहयोग और समर्थन। जब हम अपनेपन के रिश्तों में शामिल होते हैं, तो हम एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करते हैं, समस्याओं का सामना करते हैं, और आपसी समर्थन और प्रेरणा प्रदान करते हैं। इस तरह के रिश्तों में, हम एक-दूसरे के साथ जीवन की सभी मुश्किलें और सुख-दुख साझा करते हैं और इसका अहसास करते हैं कि हम अकेले नहीं हैं।
 विश्वास और आत्मविश्वास का विकास मधुर रिश्ते मैनेज करने से होता है जब हम किसी के साथ एक अपनेपन का रिश्ता बनाते हैं, तो हम आत्म-समर्थन और विश्वास के भाव को सीखते हैं। हम जानते हैं कि हमारे अपने हमेशा हमारे साथ हैं, हमें समर्थन प्रदान करते हैं और हम भी उन पर पूरा विश्वास करते हैं

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Sunday, March 17, 2024

भोजन का प्रभाव

मनुष्य जीवन पर भोजन का क्रम बहुत गहराई तक पड़ता है। जितना सात्त्विक, शुद्ध एवं उपयुक्त भोजन किया जाएगा, मनुष्य का तन-मन भी उतना ही शुद्ध एवं सात्त्विक बनेगा। निम्नकोटि एवं निम्न भावनाओं से प्राप्त अन्न मनुष्य के शरीर को अस्वस्थ एवं मलिन बना देता है। "जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन" वाली कहावत से सभी परिचित हैं। अन्न उत्पादन से लेकर ग्रहण तक उसकी शुद्धता एवं स्वच्छता पर ध्यान रखने का निर्देश शास्त्रों में किया गया है, जिससे कि उससे प्राप्त होने वाले तत्त्व एवं सूक्ष्म संस्कार विकृत होकर मनुष्य के तन-मन एवं आत्मा पर कुप्रभाव न डालने पावें; उसकी प्रवृत्तियाँ पूर्ण, पवित्र एवं उपयुक्त बनी रहें; जिससे कि वह मनुष्यता के उन्नत सोपानों पर क्रम से बढ़ता चला जाए।
      परावलंबन, पराधीनता अथवा अनाचरण से प्राप्त किया हुआ अन्न तो दूषित होता ही है, किंतु "भिक्षा" से प्राप्त किया हुआ अन्न सबसे अधिक दूषित होता है; वह चाहे पैसा माँगकर खरीदा गया हो अथवा भोजन के रूप में पाया गया हो। "भिक्षा" का अन्न मनुष्य के मन, बुद्धि तथा आत्मा के लिए विष ही है। भिखारी जब किसी से कुछ माँगता है, तब उसकी आत्मा में एक दीनता, हीनता एवं ग्लानि होती है। वह स्वयं जानता है कि अपना स्वाभिमान खोकर माँग रहा है। भिखारी यदि एक बार भूखा होने पर माँगता है, तो अनेक बार झूठ बोलकर माँग लाता है। यह एक प्रकार की ठगी है, जिसके लिए न तो उसका मन प्रसन्न होता है और न बुद्धि प्रत्युत उसकी आत्मा इस निकृष्ट कार्य के लिए धिक्कार भाव ही रखती है। ऐसे धिक्कारपूर्ण अन्न से स्वस्थ तत्त्वों का मिल सकना संभव नहीं। साथ ही अनेक बार तो देने वाला भिखारी के हठ के कारण खीझकर ही उसे कुछ डाल देता है। देने वाले एवं लेने वाले, दोनों की असद् भावनाओं के प्रभाव से अन्न के सूक्ष्म संस्कार दूषित हो जाते हैं, जो झोली पर दयनीय के रूप में प्रतिफल होते हैं। यही कारण है कि ग्लानिपूर्ण अन्न खाने से भिखारी दीन- हीन एवं मलिन दीखते रहते हैं। उनका शरीर रोगी तथा मुख निस्तेज ही बना रहता है। "भिक्षा"-भोजन करने वाला, चाहे वह कितना ही पौष्टिक भोजन क्यों न पाए, किसी प्रकार से स्वस्थ नहीं रह सकता।

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Thursday, March 14, 2024

आत्म विकास

"आत्म विकास" ....आध्यात्मिक साधना का मुख्य उद्देश्य मानवता का उच्चतम स्तर प्राप्त करना ही है। मानवता की चरमावधि पर पहुँचकर मनुष्य दैवत्व की परिधि में प्रवेश करता है और वहाँ से शनैः-शनैः उठता हुआ ईश्वरीय परिधि की ओर बढ़ता जाता है। इस प्रकार ईश्वरप्राप्ति की सोपान परंपरा में मनुष्य का विकास आदि सोपान है। आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए जिज्ञासु व्यक्ति को सर्वप्रथम अपनी "मनुष्यता" का ही विकास करने का प्रयत्न करना चाहिए। जो साधक मनुष्यता का विकास न कर सीधे-सीधे ईश्वरप्राप्ति की कामना से साधनारत रहते हैं, उनको अपने उद्देश्य में सफलता मिल सकना असंभव ही समझना चाहिए।
      "मनुष्यता" के विकास का क्रम "शरीर" से चलता हुआ "आत्मा" तक पहुँचता है और तब "आत्मविश्वास" से "आध्यात्मिक" विकास की ओर मार्ग जाता है। शारीरिक विकास का तात्पर्य उसके लंबे-चौड़े, मोटे- ताजे होने से नहीं है, वरन इसका मात्र मंतव्य उसके पूर्ण आरोग्य से है।
      शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा आत्मिक विकास यों ही आप-से-आप नहीं हो जाता, उसके लिए कुछ निश्चित नियम एवं कर्तव्य हैं, जिनका सावधानीपूर्वक पालन करना होता है। इन नियमों एवं कर्त्तव्यों के क्रम को "धर्म" कहा जाता है। इस प्रकार "धर्म" का आचरण करना ही वह उपाय है, जिसके आधार पर मनुष्य आत्मविकास की ओर बढ़ता है।

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Sunday, March 10, 2024

सुखी रहने का सही तरीका

सुखी रहने का सही तरीका सही दृष्टिकोण आज का व्यक्ति समस्याओं के जाल में दिन-दिन जकड़ता चला जा रहा है। क्या धनी, क्या निर्धन, क्या विद्वान, क्या अशिक्षित, क्या रुग्ण तथा स्वस्थ सभी स्तर के मनुष्य अपने को अभावग्रस्त और संकटग्रस्त स्थिति में पाते हैं। भूखे का पेट दर्द-दूसरी तरह का और अतिभोजी का दूसरे ढंग का; पर कष्ट पीड़ित तो दोनों ही समान रूप से हैं।
        भौतिक दृष्टि से विज्ञान ने मनुष्य के लिए अगणित प्रकार की प्रचुर साधन-सुविधाएँ उपलब्ध करा दी हैं। अब से कुछ शताब्दियों- पूर्व लोग कहीं लंबी यात्रा पर निकलते थे, तो यह मानकर चलते थे कि पता नहीं अब लौटकर परिवार वालों को देख भी सकेंगे या नहीं। इसलिए वे यात्रा पर निकलते समय परिवार की व्यवस्था इस प्रकार बनाकर चलते थे, मानो अब उनकी आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। पर अब तो मनुष्य कुछ ही दिनों में चंद्रमा की यात्रा करके भी सकुशल वापस लौट आने में समर्थ है। कहने का आशय यह कि प्राचीनकाल की तुलना में आज साधन-सुविधाओं में आकाश-पाताल जितना अंतर हो गया है। इसे कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता।
      साधनों के विकास और सुविधाओं के अंबार लग जाने पर यह होना चाहिए कि मनुष्य सुखी रहता। लेकिन देखते हैं, मनुष्य पहले की तुलना में और भी ज्यादा दुःखी और संकटग्रस्त हो गया है। उसके चारों ओर समस्याओं का जाल जकड़ता जा रहा है। सभी कोटि के मनुष्य अपने को अभावग्रस्त और संकटग्रस्त स्थिति में अनुभव करते हैं। व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन और संसार के सभी क्षेत्रों में समस्याएँ ही समस्याएँ बिखरी पड़ी हैं। विभिन्न वर्ग के विभिन्न स्तर के व्यक्तियों की समस्याएँ भिन्न-भिन्न हो सकती हैं। वे एक-दूसरे से किसी रूप में संबद्ध भी नहीं लगतीं, पर उनके मूल में यदि देखा जाय तो एक ही कारण प्रतीत होगा वह है-"अनात्मवादी दृष्टिकोण।
     प्रकाश की अनुपस्थिति का नाम ही अंधकार है। जब प्रकाश बुझ जाता है तो अंधकार आ जाता है और जब प्रकाश फैलने लगता है तो अंधकार भाग जाता है। इन दिनों साधन-सुविधाओं की दृष्टि से पर्याप्त प्रगति हुई है, पर जिस आधार पर सुख-शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत किया जा सकता है, उस "दृष्टिकोण" का अभाव ही समस्याओं का कारण बना हुआ है। अंधकार को दूर भगाने के लिए कितने ही साधन जुटाए जाएँ, कितनी ही तैयारियां की जाएँ, जब तक प्रकाश फैलाने का प्रयास न किया जाय, तब तक अंधकार बना ही रहेगा। कितने ही साधन इकट्ठे कर लिए जाएँ, कितनी ही सुविधाएँ बढ़ा ली जाएँ, पर "अनात्मवादी" दृष्टिकोण को निरस्त करने के लिए जब तक "अध्यात्म" की ज्योति नहीं जगाई जायेगी, तब तक वे प्रयास व्यर्थ ही होते चले जायेंगे।

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Friday, March 8, 2024

स्वस्थ रहना है तो सक्रियता का अभ्यास करें

स्वस्थ रहना है तो सक्रियता का अभ्यास करें "मन" का स्वस्थ होना ही ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि मन स्वस्थ होगा तो दुबला-पतला शरीर भी बहुत कुछ कर सकेगा। महात्मा गाँधी में सक्रियता और फुर्तीलापन उनके स्वस्थ मन के कारण हो था। वे जब किसी भी कार्य या संकल्प पूर्ति में जुट जाते तो उन्हें आगे-पीछे की चिंता नहीं होती थी। वर्तमान क्षण और संकल्प या कार्य ही उनके समक्ष होता था। उनकी इस अविचल, शांत, गंभीर मनःस्थिति के कारण ही महान कार्य संपन्न होते रहे
       मन का ठीक-ठीक निर्माण एवं उसे स्वस्थ बनाने के लिए निम्नलिखित बातों को जीवन में अपनाना चाहिए । इससे हमारा मन स्वस्थ बनेगा और मनः शांति बढ़ेगी। जीवन में निरंतर सक्रियता की आवश्यकता है। जो जीवन अकर्मण्य है वह एक अभिशाप ही है। कहावत भी है 'खाली दिमाग शैतान का घर है। कार्यशीलता से रहित जीवन भारस्वरूप ही है। अकर्मण्य एवं आलसी व्यक्ति सदैव इस संसार में पिछड़े हैं। ऐसे व्यक्तियों को इस संघर्षमय कर्मक्षेत्र संसार में स्थान नहीं है। जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने कोई जादू या छल से महानता प्राप्त नहीं की है। उनकी महानता का एकमात्र कारण उनका निरंतर कर्तव्यपरायण बने रहना एवं निष्ठापूर्ण जीवन बिताना ही था।उनके जीवन में 'आराम हराम' था
       जीवन की निरंतर सक्रियता में उद्दंडी मन की चंचलता, संकल्प विकल्प, वासना आदि नष्ट हो जाते हैं। कार्य व्यस्त और परिश्रमी व्यक्ति धीरे-धीरे इस चंचल मन पर बाजी मार लेते हैं। मन एक अजीब भूत है जो अपनी कल्पना एवं विचारों के सहारे आकाश-पाताल और लोक- लोकांतरों में उड़ा-उड़ा फिरता है। ऐसे मन पर काबू पाना सहज नहीं होता। इस भूत को निरंतर काम में जोते रहना ही इसे बस में करने का एक मंत्र है
         जीवन में सक्रियता की इसलिए भी आवश्यकता है कि ईश्वर ने हमें क्रिया शक्ति दी है कुछ करते रहने के लिए। अतः यदि हम अकर्मण्य रहे और ईश्वरीय विधान के विपरीत चले तो यह शक्ति हमसे छीन ली जाती है। इंद्रियाँ अपनी क्रिया शक्ति को खो देती हैं। ऐसा व्यक्ति हाथ-पैर होते हुए भी मुर्दा ही है। वह जीवन में पराधीनता के सिवाय और कुछ नहीं देख सकता

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Tuesday, February 20, 2024

दाम्पत्य जीवन प्रगति रथ के दो पहिए

"दाम्पत्य जीवन" के ऊपर पारिवारिक, सामाजिक, व्यक्तिगत सभी तरह की उन्नति और विकास निर्भर करते हैं। पति-पत्नी के सहयोग, एकता, परस्पर आत्मोत्सर्ग, त्याग-सेवा आदि से दाम्पत्य जीवन की सुखद और स्वर्गीय अनुभूति सहज ही की जा सकती है इससे मनुष्य के आंतरिक और बाह्य जीवन के विकास में बड़ा योग मिलता है सभी भाँति, स्वस्थ, संतुलन, सुन्दर दाम्पत्य जीवन स्वर्ग की सीढ़ी है और मानव विकास का प्रेरणा-स्रोत है
       जीवन लक्ष्य की लम्बी मंजिल को तय करने के लिए पति-पत्नी का अनन्य संयोग यात्रा को सहज और सुगम बना देता है नारी शक्ति है तो पुरुष पौरुष बिना "पौरुष" के शक्ति व्यर्थ ही धरी रह जाती है तो बिना "शक्ति" के "पौरुष" भी किसी काम नहीं आता। वह अपंग है। "शक्ति" और "पौरुष" का समान प्रवाह, संयोग, एकता नवसृजन के लिए, नव-निर्माण के लिए आवश्यक है।इनकी परस्पर असंगति, असमानता ही अवरोध, हानि, अवनति का कारण बन जाती है। पति-पत्नी में यदि परस्पर विग्रह, आपाधापी, स्वार्थपरता, द्वेष, स्वेच्छाचार की आग सुलग जायेगी तो दाम्पत्य जीवन का सौन्दर्य, विकास, प्रगति महत्त्वपूर्ण संभावनाओं का स्वरूप अपने गर्भ में ही नष्ट हो जायेगा
       पति-पत्नी संसार-पथ पर चलने वाले जीवन-रथ के दो पहिये हैं, जिनमें एक की स्थिति पर दोनों की गति-प्रगति निर्भर करती है। दोनों का चुनाव जितना ठीक होगा उतना ही सुखद, स्वर्गीय, उन्नत और प्रगतिशील बनेगा दोनों में से एक भी अयोग्य-कमजोर हो तो दाम्पत्य जीवन का रथ डगमगाने लगेगा और पता नहीं वह कहीं भी दुर्घटनाग्रस्त होकर नष्ट-भ्रष्ट हो फिसल जाये अथवा मार्ग में ही अटक जाये इससे न केवल पति-पत्नी वरन परिवार-समाज के जीवन में गतिरोध पैदा होगा, क्योंकि "दाम्पत्य जीवन" पर ही "परिवार" का भवन खड़ा होता है और "परिवार" से ही "समाज" बनता है, इसलिए पति-पत्नी का चुनाव एक महत्त्वपूर्ण पहलू है
     बड़ी-बड़ी आशा-आकांक्षाओं के साथ नवयुवक और नवयुवतियाँ दाम्पत्य जीवन के सूत्र में बँधते हैं बड़ी-बड़ी रस्में अदा होती हैं, विवाह के रूप में बड़ा समारोह मनाया जाता है गाजे-बाजे, रोशनी, दावतों, लेन-देन, बरात, जुलूस आदि के साथ दो प्राणी विवाह-सूत्र में बँधते हैं। परस्पर के नये आकर्षण से प्रारम्भिक दिनों दोनों का जीवन बड़ा सुखद दीखता है किन्तु यह स्थिति अधिक दिन तक नहीं रहती और दाम्पत्य-जीवन कलह, अशांति, द्वेष, असन्तोष की आग में जलने लगता है
       परिपाटी के तौर पर जो प्रतिज्ञाएँ धर्म पुरोहित उच्चारण कर देते हैं, उनका व्यावहारिक जीवन में नाम भी नहीं रहता दाम्पत्य जीवन एक-दूसरे के लिए बोझा बन जाता है इसका कोई बाह्य कारण नहीं अपितु पति-पत्नी दोनों के ही परस्पर व्यवहार-आचरणों में विकृति पैदा होने पर ही अक्सर ऐसा होता है। यदि इन छोटी-छोटी बातों में सुधार कर लिया जाये तो दाम्पत्य जीवन परस्पर सुख, शांति, आनन्द का केन्द्र बन जाये।।


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Tuesday, February 6, 2024

कठिनाईयो को अधिक न आंके

अपनी कठिनाइयों को  अधिक न आंके जीवन को शांतिपूर्ण रीति से व्यतीत करने का तरीका यह है कि हम अपनी कठिनाइयों का मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर न आँकें। वरन उतना ही समझें जितनी कि वे वास्तव में हैं इससे हमारी अनेक दुश्चिंताएँ, आसानी से नष्ट हो सकती हैं
        एक विद्यार्थी परीक्षा में अनुत्तीर्ण होता है फेल होने के समाचार से उसका मानसिक संतुलन डगमगा जाता है वह इस असफलता को वज्रपात जैसी मानता है सोचता है सारी दुनिया मुझे धिक्कारेगी, मूर्ख या आलसी समझेगी, मित्रों के सामने मेरी सारी प्रतिष्ठा धूल में मिल आएगी, अभिभावक कटु शब्द कहकर मेरा तिरस्कार करेंगे, यह कल्पना उसे असह्य लगती है, चित्त में भारी क्षोभ उत्पन्न होता है और रेल के आगे कटकर, नदी में कूदकर या और किसी प्रकार वह अपनी आत्महत्या कर लेता है, घरभर में कुहराम मच जाता है, वृद्ध माता-पिता रो-रोकर अंधे हो जाते हैं एक उल्लासपूर्ण हँसते-खेलते घर का वातावरण शोक, क्षोभ और निराशा में परिणत हो जाता है इस विपन्न स्थिति को उत्पन्न करने में सारा दोष उस गलत दृष्टिकोण का है जिसके अनुसार एक छोटी-सी असफलता को इतना बढ़ा- चढ़ाकर आंका गया
       एक दूसरा विद्यार्थी भी उसी कक्षा में अनुत्तीर्ण होता है उसे भी दुःख तो होता है, पर वह वस्तुस्थिति का सही मूल्यांकन कर लेता है और सोचता है कि इस वर्ष बोर्ड का परीक्षाफल 43 प्रतिशत ही तो रहा है, मेरे समान अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या 57 प्रतिशत है। वर्तमान परिस्थितियों में अनुत्तीर्ण होना एक साधारण-सी बात है, इसमें सदा विद्यार्थी ही दोषी नहीं होता, वरन प्राय: शिक्षकों की उदासीनता, बिना पढ़े हुए विषयों के परचे आ जाना और नंबर देने वालों की लापरवाही भी उसका कारण होती है, इस वर्ष अनुत्तीर्ण हो गए तो अगले वर्ष अधिक परिश्रम करने से अच्छी डिवीजन में उत्तीर्ण होने की आशा रहेगी, आदि बातों से अपने मन को समझा लेता है और अनुत्तीर्ण होने की खिन्नता को जल्दी ही अपने मन से हटाकर आगे के कार्यक्रम में लग जाता है
      दोनों ही छात्र एक ही समय एक ही कक्षा में अनुत्तीर्ण हुए थे एक ने आत्महत्या कर ली, दूसरे ने उस बात को मामूली मानकर अपना साधारण क्रम जारी रखा फेर केवल  समझ का था परिस्थिति का नहीं, यदि परिस्थिति का होता तो दोनों को समान दुःख होना चाहिए था और दोनों को आत्महत्या करनी चाहिए थी, पर ऐसा होता नहीं, इससे स्पष्ट है कि परिस्थितियों के मूल्यांकन में गड़बड़ी होने से मानसिक संतुलन बिगड़ा और उसी से दुर्घटना घटित हुई।

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Friday, January 26, 2024

मन की शक्तियों को जाने

मन की शक्तियों को भी जानिए जिस प्रकार ज्ञान का कोई स्वरूप नहीं है वह मन की ही एक शक्ति है उसी प्रकार मन का भी कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। इच्छा और विचार करने की शक्ति का ही नाम मन है इसलिए मनोनिग्रह के लिए, मन को वश में रखने के लिए सर्वोत्तम उपाय यह है कि उसे निरंतर विचार-निमग्न रखा जाय एक विचार की दूसरे विचार से काट-छाँट और स्थानापत्ति की जाती रहे
          मन में अधिकांश वही इच्छाएँ उठती हैं जो तत्काल या अल्प काल मैं सुख दे सकती हैं इंद्रियों के सुख उनमें प्रधान हैं। मनुष्य का मन जब तक इन नन्हीं-नन्हीं इच्छाओं में फँसा रहता है तब तक न उसकी शक्ति प्रकट होती है, न मनुष्य जीवन की उपयोगिता, इसलिए यह आवश्यक है कि हम आध्यात्मिक जीवन का भी चिंतन किया करें वैराग्य ऐसे ही चिंतन का नाम है जिसमें हम लोकोत्तर जीवन की कल्पना और सत्य जानने का प्रयास करते हैं मन, बुद्धि, चित्त आदि शक्तियाँ मिली भी मनुष्य को इसलिए हैं कि मनुष्य अपना पारमार्थिक उद्देश्य हल कर सके 
   भगवान् श्रीकृष्ण ने भी गीता में वैराग्य को मनोनिग्रह का उपाय बताया है अभ्यास से उद्धत मन वश में होता है, वैराग्य से उसे निर्मल,कोमल और शांत बनाया जा सकता है
          हुआ यह है कि हमने अपने जीवन को बहिर्मुखी बना लिया है। हम उतना ही सोचते हैं जितना व्यक्त है, दिखाई देता है, पर बहुत भी है जो दिखाई नहीं देता पर उसका स्वरूप है। वह शाश्वत सत्य भी है अनेक वस्तुएँ ऐसी हैं जिनसे इस जीवन में वैभव और इंद्रिय भोग का सुख दिखाई देता है पर जन्म-मरण का भय, प्रियजनों का विछोह, खांसी, बुखार-बीमारी, कटुता-कलह, अत्याचार, भय, विद्वेष प्राकृतिक प्रकोप यह सब मनुष्य के बहिर्मुखी जीवन का गतिरोध करते हैं आवश्यक है कि इनसे मनुष्य क्षुब्ध हो और दुःख अनुभव करे इन संपूर्ण अभावों से परे जो सनातन आनंद की स्थिति है वह कैसे प्राप्त हो ? जन्म-मृत्यु का बंधन और भय कैसे मिटे ? शरीर से परे यह जो आत्मा है जो चलता, हिलता, डुलता, बोलता है उसकी उपलब्धि कैसे हो ? यह ऐसे प्रश्न हैं जिन पर विचार करके मनुष्य अपने मन को अंतर्मुखी बना सकता है , वैराग्य का यही स्वरूप भी है कि मनुष्य लौकिक सुख-साधनों का चिंतन करता है उससे अधिक अमरत्व का, शाश्वत सुख और सनातन स्वरूप का भी चिंतन करे।।
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Saturday, January 20, 2024

हमारा व्यक्तिव ऐसे बनता हैं

हमारा व्यक्तित्व ऐसे बनता है "क्रिया स्थूल है और "ज्ञान" सूक्ष्म। क्रिया तक सीमित न रहकर, तत्त्वचिंतन की गहराई में उतरने के प्रयत्न में, हमें चैन और संतोष मिलता है। एक परत इससे भी गहरी है, जिसे "अंतरात्मा" कहते हैं। यहाँ आस्थाएँ रहती हैं। अपने संबंध में प्रिय और अप्रिय के, उचित और अनुचित के, आदतों और प्रचलनों के, पक्ष और सिद्धांतों के संबंध में अनेकानेक मान्यताएँ, इसी केंद्र में गहराई तक जड़ें जमाए बैठी रहती हैं। "व्यक्तित्व" का समूचा ढाँचा, यहीं विनिर्मित होता है। मस्तिष्क और शरीर को तो व्यर्थ ही दोष या श्रेय दिया जाता है। वे दोनों ही वफादार सेवक की तरह हर आत्मा की ड्यूटी ठीक तरह बजाते रहते हैं। उनमें अवज्ञा करने की कोई शक्ति नहीं। आस्थाएँ ही प्रेरणा देती हैं और उसी पेट्रोल से धकेले जाने पर जीवन स्कूटर के दोनों पहिये-चिंतन और कर्तृत्व सरपट दौड़ने लगते हैं। *व"व्यक्तित्व" क्या है-"आस्था"। मनुष्य क्या है-"श्रद्धा"। "चेष्टाएँ" क्या हैं-"आकांक्षा" की प्रतिध्वनि। गुण, कर्म, स्वभाव अपने आप न बनते हैं और न बिगड़ते हैं। "आस्थाएँ" ही आदतें बनकर परिपक्व हो जाती हैं तो उन्हें "स्वभाव" कहते हैं। अभ्यासों को ही "गुण" कहते हैं
        कर्म आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए शरीर और मन को संयुक्त रूप से जो श्रम करना पड़ता है, उसी को कर्म कहते हैं। इन तथ्यों को समझ लेने के उपरांत यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्तित्व के स्तर और उसकी प्रतिक्रिया के रूप में आने वाले सुख-दुःखों की अनुभूति होती रहती है। प्रसन्नता और उद्विग्नता को यों परिस्थितियों के उतार-चढ़ावों से जोड़ा जाता है, पर वस्तुत: वे मनःस्थिति के सुसंस्कृत और अनगढ़ होने के कारण सामान्य जीवन में नित्य ही आती रहने वाली घटनाओं से ही उत्पन्न अनुभूतियाँ भर होती हैं। *कोई घटना न अपने आप में "महत्त्वपूर्ण" है और न "महत्त्वहीन"। यहाँ सब कुछ अपने ढर्रे पर लुढ़क रहा है। सरदी-गरमी की तरह भाव और अभाव का, जन्म-मरण तथा हानि-लाभ का क्रम चलता रहता है। हमारे चिंतन का स्तर ही उनमें कभी प्रसन्नता अनुभव करता और कभी उद्विग्न हो उठता है। अनुभूतियों में परिस्थितियाँ नहीं, मन:स्थिति की भूमिका ही काम करती है।

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Friday, January 12, 2024

हमारे देश की महान सम्पदा अध्यात्म

       "अध्यात्म" भारत की महानतम संपत्ति है। उसे मानवता का मेरुदंड कहा जा सकता है। मनुष्य के भौतिक एवं आध्यात्मिक चिरस्थायी उत्कर्ष का एकमात्र आधार यही है। मनुष्य जाति की अगणित समस्याओं को हल करने और सुख-शांतिपूर्वक जीने के लिए "अध्यात्म" ही एकमात्र उपाय है। इस जीवनतत्त्व की उपेक्षा करने से पतन और विनाश का ही मार्ग प्रशस्त होता है। दुःख और दारिद्रय, शोक और संताप इसी उपेक्षा के कारण उत्पन्न होते हैं। मनुष्य के भविष्य को अंधकारमय बनाने वाला निमित्त इस उपेक्षा से बढ़कर और कोई नहीं हो सकता।
     "अध्यात्म" मानव जीवन के श्रेष्ठतम सदुपयोग की एक वैज्ञानिक पद्धति है। उसे जीवन जीने की विद्या भी कहा जा सकता है। छोटे- छोटे कार्यों की भी कोई प्रणाली एवं पद्धति होती है, उसी ढंग से चलने पर सफलता मिलती है। अस्त-व्यस्त ढंग से कार्य किया जाए तो लाभ के स्थान पर हानि ही होगी। मानव जीवन इस संसार का सर्वोत्कृष्ट वरदान है। भगवान के पास जो कुछ विभूतियाँ हैं, वे सभी मनुष्य शरीर में बीज रूप में भर दी हैं। ऐसे बहुमूल्य संयंत्र का सुसंचालन एवं सदुपयोग यदि प्राप्त न हो तो उसे एक दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। मानव जीवन एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं मूल्यवान क्रिया है।उसका विज्ञान एवं विधान जाने बिना या जानकर उस पर चले बिना यह आनंद और श्रेय नहीं मिल सकता जो मनुष्य जीवन जीने वाले को मिलना ही चाहिए।
     खेदपूर्वक यह स्वीकार करना होगा कि हमारे आलस्य और प्रमाद ने योग की उन उच्च स्तरीय विद्याओं को गंवा दिया। वैज्ञानिक शोध जैसी निष्ठा में संलग्न होने वाले साधक आज कहां ! जो हैं उन्हें बहुत कुछ मिलता भी है । जिनके आशीर्वाद प्राप्त करके मनुष्य अपना जीवन धन्य और सफल बना सके ऐसे ऋषि कल्प सत्पुरुष अभी भी मौजूद हैं

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Thursday, January 11, 2024

दोषों का परिमार्जन

दोषों का परिमार्जन
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से संभव है
       मनोविज्ञानी बताते हैं कि हर मनुष्य में अपनी विशेषता और बलिष्ठता सिद्ध करने की स्वाभाविक महत्वाकांक्षा होती है। उसे पूरा करने का सहज तरीका तो अपनी योग्यता एवम् सफलता सिद्ध करने का ही हो सकता है, पर इसके लिए जिस दृढ़ता, तत्परता और कुशलता की आवश्यकता होती है वह जुट नहीं पाती, ऐसी दशा में हानि पहुँचाने की क्षमता प्रदर्शित करने का आंतकवादी तरीका अपनाना पड़ता है। इसी में शौर्य, पराक्रम समझा जाता है। आक्रमण करके दूसरों को नीचा दिखाना और अपनी सामर्थ्य सिद्ध करना भी लड़ाइयों की तरह ही एक बड़ा कारण होता है। बहाना तो किसी छोटे-मोटे अप्रिय प्रसंग का ही ले लिया जाता है।अपराधियों की दुष्टताएँ इससे भिन्न हैं जो चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार की उद्दंडता बरतने और मर्यादाएँ तोड़ने के रूप में सामने आती रहती हैं। उनमें अर्थ लोभ एवं द्वेष बुद्धि की प्रधानता रहती है। दुस्साहस का अहंकार भी उसमें जुड़ा रहता है
         नई पीढ़ी के वैज्ञानिक कहते हैं कि युद्ध मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं है। स्वभावतः मनुष्य सामाजिक और सहयोगी प्रकृति का है, उसे सुविधा और खुशी चाहिए। युद्ध में आघात-प्रत्याघात से हर दृष्टि से हानि ही हानि उठानी पड़ती है। जीतने वाला भी घाटे में ही रहता है। ऐसी दशा में युद्ध को स्वाभाविक प्रकृति नहीं माना जा सकता, वह कुसंस्कारों एवं विकृत वातावरण की प्रतिक्रिया ही माना जा सकता है
          "अहमन्यता" का विकृत रूप उद्दंडता है, जिसकी ओछी पूर्ति दूसरों का तिरस्कार करके की जा सकती है। झगड़ालू स्वभाव में यही तथ्य काम करता है। यदि मनुष्य को आरंभ से ही शिष्टता, शालीनता, नम्रता और नागरिकता की शिक्षा दी जाए तो वह आक्रमण की अपेक्षा दूसरों की सहायता करने और बदले में श्रेय-सम्मान पाने की बात सोचेगा। ऐसी दशा में मतभेद और स्वार्थ विपर्यय होते हुए भी ऐसा मार्ग खोज लिया जाएगा, जिसमें झंझट कम खड़ा हो और गुत्थी शांति से सुलझ जाए।

Monday, January 8, 2024

आध्यात्मिक दृष्टि कोण

दोषों का परिमार्जन
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से संभव है
       मनोविज्ञानी बताते हैं कि हर मनुष्य में अपनी विशेषता और बलिष्ठता सिद्ध करने की स्वाभाविक महत्वाकांक्षा होती है। उसे पूरा करने का सहज तरीका तो अपनी योग्यता एवम् सफलता सिद्ध करने का ही हो सकता है, पर इसके लिए जिस दृढ़ता, तत्परता और कुशलता की आवश्यकता होती है वह जुट नहीं पाती, ऐसी दशा में हानि पहुँचाने की क्षमता प्रदर्शित करने का आंतकवादी तरीका अपनाना पड़ता है। इसी में शौर्य, पराक्रम समझा जाता है। आक्रमण करके दूसरों को नीचा दिखाना और अपनी सामर्थ्य सिद्ध करना भी लड़ाइयों की तरह ही एक बड़ा कारण होता है। बहाना तो किसी छोटे-मोटे अप्रिय प्रसंग का ही ले लिया जाता है।अपराधियों की दुष्टताएँ इससे भिन्न हैं जो चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार की उद्दंडता बरतने और मर्यादाएँ तोड़ने के रूप में सामने आती रहती हैं। उनमें अर्थ लोभ एवं द्वेष बुद्धि की प्रधानता रहती है। दुस्साहस का अहंकार भी उसमें जुड़ा रहता है
         नई पीढ़ी के वैज्ञानिक कहते हैं कि युद्ध मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं है। स्वभावतः मनुष्य सामाजिक और सहयोगी प्रकृति का है, उसे सुविधा और खुशी चाहिए। युद्ध में आघात-प्रत्याघात से हर दृष्टि से हानि ही हानि उठानी पड़ती है। जीतने वाला भी घाटे में ही रहता है। ऐसी दशा में युद्ध को स्वाभाविक प्रकृति नहीं माना जा सकता, वह कुसंस्कारों एवं विकृत वातावरण की प्रतिक्रिया ही माना जा सकता है
          "अहमन्यता" का विकृत रूप उद्दंडता है, जिसकी ओछी पूर्ति दूसरों का तिरस्कार करके की जा सकती है। झगड़ालू स्वभाव में यही तथ्य काम करता है। यदि मनुष्य को आरंभ से ही शिष्टता, शालीनता, नम्रता और नागरिकता की शिक्षा दी जाए तो वह आक्रमण की अपेक्षा दूसरों की सहायता करने और बदले में श्रेय-सम्मान पाने की बात सोचेगा। ऐसी दशा में मतभेद और स्वार्थ विपर्यय होते हुए भी ऐसा मार्ग खोज लिया जाएगा, जिसमें झंझट कम खड़ा हो और गुत्थी शांति से सुलझ जाए।

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Saturday, January 6, 2024

कर्म का फल भावना पर आधारित होता हैं

कर्म का फल भावना पर निर्भर है
         भीतरी दुनिया में गुप्त-चित्र, या चित्रगुप्त पुलिस और अदालत महकमों का काम स्वयं ही करता है। बाहरी दुनियाँ में तो यदि पुलिस झूठा सबूत दे दे तो अदालत का फैसला भी अनुचित हो सकता हैं, परन्तु भीतरी दुनियाँ में ऐसी गड़बड़ी की संभावना नहीं अन्तःकरण सब कुछ जानता है कि यह कर्म किस विचार से, किस इच्छा से, किस परिस्थिति में, क्यों कर किया गया था वहाँ बाहरी मन को सफाई या बयान देने की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि गुप्त मन उस बात के संबंध में स्वयं ही पूरी-पूरी जानकारी रखता है। हम जिस "इच्छा" से, जिस "भावना" से जो काम करते हैं उस "इच्छा" या "भावना" से ही पाप-पुण्य का नाप होता है
    भौतिक वस्तुओं की तौल नाप बाहरी दुनियाँ में होती है। एक गरीब आदमी दो पैसा दान करता है और एक धनी आदमी दस हजार रुपया दान करता है बाहरी दुनियाँ तो पुण्य की तौल रुपये-पैसों की गिनती के अनुसार करेगी दो पैसा दान करने वाले की ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देखेगा, पर दस हजार रुपया देने वाले की प्रशंसा चारों ओर फैल जायेगी। भीतरी दुनियाँ में यह तौल-नाप नहीं चलती बाहर की दुनियाँ में रुपयों की गिनती से, काम के बाहरी फैलाव से, कथा-वार्ता से, तीर्थयात्रा आदि भौतिक चीजों से यश खरीदा जाता है, पर चित्र गुप्त देवता के देश में यह सिक्का ही नहीं चलता, वहाँ तो इच्छा और भावना की नाप-तौल है उसी के मुताबिक पाप-पुण्य का जमा- खर्च किया जाता है भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उकसा कर लाखों आदमियों को महाभारत के युद्ध में मरवा डाला लाशों से भूमि पट गई, खून की नदियाँ बह गई फिर भी अर्जुन को कोई पाप नहीं लगा अर्जुन का उद्देश्य पवित्र था, वह पाप को नष्ट करके धर्म की स्थापना करना चाहता था बस वही इच्छा खुफिया रजिस्टर में दर्ज हो गई आदमियों के मरने जीने की संख्या का कोई हिसाब नहीं लिखा गया। दुनियाँ में करोड़पति की बड़ी प्रतिष्ठा है, पर यदि उसका दिल खोटा है तों चित्रगुप्त के दरबार में भिखमंगा शुमार किया जायगा। दुनियाँ का भिखमंगा यदि दिल का धनी है तो उसे बादशाह गिना जायगा इस प्रकार मनुष्य जो भी काम कर रहा है वह किस नीयत से कर रहा है, वह नीयत, भलाई या बुराई, जिस दर्जे में जाती होगी उसी में दर्ज कर ली जायगी सद्भाव से फाँसी लगाने वाला एक जल्लाद भी पुण्यात्मा गिना जा सकता है और एक धर्मध्वजी तिलकधारी पण्डित भी गुप्त रूप से दुराचार करने पर पापी माना जा सकता है बाहरी आडम्बर का कुछ मूल्य नहीं है, कीमत भीतरी चीज की है सीप की कुछ कीमत नहीं, मोल-तोल तो मोती का है। बाहर से कोई काम भला या बुरा दिखाई दे, तो उससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। असली तत्व तो उस "इच्छा" और "भावना" में है, जिससे प्रेरित होकर वह काम किया गया है पाप-पुण्य की जड़ कार्य और प्रदर्शन में नहीं, वरन् निश्चित रूप से "इच्छा" और "भावना" में ही है।

Friday, January 5, 2024

जागरूक व्यक्ति युग की पुकार सुनें

जागरूक व्यक्ति युग की पुकार सुनें
          ईश्वरीय शक्ति का अवतरण प्राकट्य हर ऐसे संधिकाल में होता है, जब परिवर्तन के अलावा कोई उपाय नहीं रह जाता। उसके स्वरूप और क्रिया- कलाप में हेर-फेर अवश्य होता रहता है। हिरण्याक्ष राक्षस जब धरती को समुद्र में ले जाकर छिप गया तो भगवान को वाराह का रूप धारण करना पड़ा। हिरण्यकशिपु को वरदान था कि वह न मनुष्य से मारा जा सकेगा और न पशु से, न घर में मारा जा सकेगा और न बाहर, न मल्ल युद्ध में मारा जा सकेगा न शस्त्र युद्ध में। इसलिए भगवान को मनुष्य और सिंह का सम्मिलित रूप धारण कर देहरी में नखों को शस्त्र की तरह उपयोग कर हिरण्यकशिपु का संहार करना पड़ा। इसी प्रकार आतताइयों का संहार करने के लिए परशुराम, मर्यादा की स्थापना के लिए राम, योग का कर्म प्रधान रूप प्रस्तुत करने के लिए कृष्ण और बौद्धिक क्रांति के लिए बुद्ध को अवतरित होना पड़ा। इस अवतरण प्रक्रिया में कहीं भी जड़ता नहीं है, अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना ही प्रधान लक्ष्य रहा है।*

      *आज की परिस्थितियाँ भिन्न हैं। पहले असुरता सीधे आक्रमण करती थी और समाज व्यवस्था को अस्त-व्यस्त, तहस-नहस करती थी। आज असुरता ने छद्म आक्रमण की नीति अपनाई और वह जनमानस में विकृतियाँ उत्पन्न कर रही है। आदर्शों और मर्यादाओं की अवज्ञा इस व्यापक स्तर पर होने लगी है कि उनके लिए कटिबद्ध व्यक्ति अपवाद बनते चले जा रहे हैं। ईश्वर के अस्तित्व को मानने और देवस्थानों पर प्रतिमा के सामने सिर झुकाने वालों का अभाव नहीं है। अभाव है उन व्यक्तियों का जिन्हें सच्चे अर्थों में आस्तिक कहा जा सके। ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करने वाला उतना नास्तिक नहीं है, जितना कि उसे मानते हुए भी आदर्शों और मर्यादाओं की अवज्ञा करने वाला। फलत: इन दिनों चारों ओर जितने भी संकट, जितनी भी समस्याएँ दिखाई देती हैं, उनके मूल को खोजें तो विदित होगा कि आज का संकट आस्थाओं का संकट है।
     इस बार नवयुग की, "युग गायत्री" की अवतरण प्रक्रिया भी असुरता के उन्मूलन और देवत्व के उदय के सनातन उद्देश्य से पूर्ण है। परिस्थितियों के अनुरूप उस चेतना के उदय हेतु प्रयासों का स्वरूप भी भिन्न होगा। अवांछनीयता, असुरता को निरस्त करने का यह धर्म युद्ध धर्मक्षेत्र में, अंत:करण की गहराई में उतरकर लड़ा जाना है और जनमानस के परिष्कार द्वारा आस्थाओं के परिशोधन द्वारा नवयुग के निर्माण में ग्वाल-वालों की रीछ-वानरों की भूमिका निभाने के लिए हर जागरूक व्यक्ति को आगे आना है।

पढ़ते रहे ब्लॉग #जनयुग के प्रहरी 

समय का चक्र और संघर्ष की कहानी

जनयुग के प्रहरी में आप पढ़े 😊 समय का चक्र और अज्ञातवास की कहानी, संघर्ष की कहानी  समय का पहिया घूमता रहता है, और हमें अपने जीवन में कई बार ...