Monday, January 8, 2024

आध्यात्मिक दृष्टि कोण

दोषों का परिमार्जन
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से संभव है
       मनोविज्ञानी बताते हैं कि हर मनुष्य में अपनी विशेषता और बलिष्ठता सिद्ध करने की स्वाभाविक महत्वाकांक्षा होती है। उसे पूरा करने का सहज तरीका तो अपनी योग्यता एवम् सफलता सिद्ध करने का ही हो सकता है, पर इसके लिए जिस दृढ़ता, तत्परता और कुशलता की आवश्यकता होती है वह जुट नहीं पाती, ऐसी दशा में हानि पहुँचाने की क्षमता प्रदर्शित करने का आंतकवादी तरीका अपनाना पड़ता है। इसी में शौर्य, पराक्रम समझा जाता है। आक्रमण करके दूसरों को नीचा दिखाना और अपनी सामर्थ्य सिद्ध करना भी लड़ाइयों की तरह ही एक बड़ा कारण होता है। बहाना तो किसी छोटे-मोटे अप्रिय प्रसंग का ही ले लिया जाता है।अपराधियों की दुष्टताएँ इससे भिन्न हैं जो चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार की उद्दंडता बरतने और मर्यादाएँ तोड़ने के रूप में सामने आती रहती हैं। उनमें अर्थ लोभ एवं द्वेष बुद्धि की प्रधानता रहती है। दुस्साहस का अहंकार भी उसमें जुड़ा रहता है
         नई पीढ़ी के वैज्ञानिक कहते हैं कि युद्ध मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं है। स्वभावतः मनुष्य सामाजिक और सहयोगी प्रकृति का है, उसे सुविधा और खुशी चाहिए। युद्ध में आघात-प्रत्याघात से हर दृष्टि से हानि ही हानि उठानी पड़ती है। जीतने वाला भी घाटे में ही रहता है। ऐसी दशा में युद्ध को स्वाभाविक प्रकृति नहीं माना जा सकता, वह कुसंस्कारों एवं विकृत वातावरण की प्रतिक्रिया ही माना जा सकता है
          "अहमन्यता" का विकृत रूप उद्दंडता है, जिसकी ओछी पूर्ति दूसरों का तिरस्कार करके की जा सकती है। झगड़ालू स्वभाव में यही तथ्य काम करता है। यदि मनुष्य को आरंभ से ही शिष्टता, शालीनता, नम्रता और नागरिकता की शिक्षा दी जाए तो वह आक्रमण की अपेक्षा दूसरों की सहायता करने और बदले में श्रेय-सम्मान पाने की बात सोचेगा। ऐसी दशा में मतभेद और स्वार्थ विपर्यय होते हुए भी ऐसा मार्ग खोज लिया जाएगा, जिसमें झंझट कम खड़ा हो और गुत्थी शांति से सुलझ जाए।

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