मन में अधिकांश वही इच्छाएँ उठती हैं जो तत्काल या अल्प काल मैं सुख दे सकती हैं इंद्रियों के सुख उनमें प्रधान हैं। मनुष्य का मन जब तक इन नन्हीं-नन्हीं इच्छाओं में फँसा रहता है तब तक न उसकी शक्ति प्रकट होती है, न मनुष्य जीवन की उपयोगिता, इसलिए यह आवश्यक है कि हम आध्यात्मिक जीवन का भी चिंतन किया करें वैराग्य ऐसे ही चिंतन का नाम है जिसमें हम लोकोत्तर जीवन की कल्पना और सत्य जानने का प्रयास करते हैं मन, बुद्धि, चित्त आदि शक्तियाँ मिली भी मनुष्य को इसलिए हैं कि मनुष्य अपना पारमार्थिक उद्देश्य हल कर सके
भगवान् श्रीकृष्ण ने भी गीता में वैराग्य को मनोनिग्रह का उपाय बताया है अभ्यास से उद्धत मन वश में होता है, वैराग्य से उसे निर्मल,कोमल और शांत बनाया जा सकता है
हुआ यह है कि हमने अपने जीवन को बहिर्मुखी बना लिया है। हम उतना ही सोचते हैं जितना व्यक्त है, दिखाई देता है, पर बहुत भी है जो दिखाई नहीं देता पर उसका स्वरूप है। वह शाश्वत सत्य भी है अनेक वस्तुएँ ऐसी हैं जिनसे इस जीवन में वैभव और इंद्रिय भोग का सुख दिखाई देता है पर जन्म-मरण का भय, प्रियजनों का विछोह, खांसी, बुखार-बीमारी, कटुता-कलह, अत्याचार, भय, विद्वेष प्राकृतिक प्रकोप यह सब मनुष्य के बहिर्मुखी जीवन का गतिरोध करते हैं आवश्यक है कि इनसे मनुष्य क्षुब्ध हो और दुःख अनुभव करे इन संपूर्ण अभावों से परे जो सनातन आनंद की स्थिति है वह कैसे प्राप्त हो ? जन्म-मृत्यु का बंधन और भय कैसे मिटे ? शरीर से परे यह जो आत्मा है जो चलता, हिलता, डुलता, बोलता है उसकी उपलब्धि कैसे हो ? यह ऐसे प्रश्न हैं जिन पर विचार करके मनुष्य अपने मन को अंतर्मुखी बना सकता है , वैराग्य का यही स्वरूप भी है कि मनुष्य लौकिक सुख-साधनों का चिंतन करता है उससे अधिक अमरत्व का, शाश्वत सुख और सनातन स्वरूप का भी चिंतन करे।।
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