Friday, January 26, 2024

मन की शक्तियों को जाने

मन की शक्तियों को भी जानिए जिस प्रकार ज्ञान का कोई स्वरूप नहीं है वह मन की ही एक शक्ति है उसी प्रकार मन का भी कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। इच्छा और विचार करने की शक्ति का ही नाम मन है इसलिए मनोनिग्रह के लिए, मन को वश में रखने के लिए सर्वोत्तम उपाय यह है कि उसे निरंतर विचार-निमग्न रखा जाय एक विचार की दूसरे विचार से काट-छाँट और स्थानापत्ति की जाती रहे
          मन में अधिकांश वही इच्छाएँ उठती हैं जो तत्काल या अल्प काल मैं सुख दे सकती हैं इंद्रियों के सुख उनमें प्रधान हैं। मनुष्य का मन जब तक इन नन्हीं-नन्हीं इच्छाओं में फँसा रहता है तब तक न उसकी शक्ति प्रकट होती है, न मनुष्य जीवन की उपयोगिता, इसलिए यह आवश्यक है कि हम आध्यात्मिक जीवन का भी चिंतन किया करें वैराग्य ऐसे ही चिंतन का नाम है जिसमें हम लोकोत्तर जीवन की कल्पना और सत्य जानने का प्रयास करते हैं मन, बुद्धि, चित्त आदि शक्तियाँ मिली भी मनुष्य को इसलिए हैं कि मनुष्य अपना पारमार्थिक उद्देश्य हल कर सके 
   भगवान् श्रीकृष्ण ने भी गीता में वैराग्य को मनोनिग्रह का उपाय बताया है अभ्यास से उद्धत मन वश में होता है, वैराग्य से उसे निर्मल,कोमल और शांत बनाया जा सकता है
          हुआ यह है कि हमने अपने जीवन को बहिर्मुखी बना लिया है। हम उतना ही सोचते हैं जितना व्यक्त है, दिखाई देता है, पर बहुत भी है जो दिखाई नहीं देता पर उसका स्वरूप है। वह शाश्वत सत्य भी है अनेक वस्तुएँ ऐसी हैं जिनसे इस जीवन में वैभव और इंद्रिय भोग का सुख दिखाई देता है पर जन्म-मरण का भय, प्रियजनों का विछोह, खांसी, बुखार-बीमारी, कटुता-कलह, अत्याचार, भय, विद्वेष प्राकृतिक प्रकोप यह सब मनुष्य के बहिर्मुखी जीवन का गतिरोध करते हैं आवश्यक है कि इनसे मनुष्य क्षुब्ध हो और दुःख अनुभव करे इन संपूर्ण अभावों से परे जो सनातन आनंद की स्थिति है वह कैसे प्राप्त हो ? जन्म-मृत्यु का बंधन और भय कैसे मिटे ? शरीर से परे यह जो आत्मा है जो चलता, हिलता, डुलता, बोलता है उसकी उपलब्धि कैसे हो ? यह ऐसे प्रश्न हैं जिन पर विचार करके मनुष्य अपने मन को अंतर्मुखी बना सकता है , वैराग्य का यही स्वरूप भी है कि मनुष्य लौकिक सुख-साधनों का चिंतन करता है उससे अधिक अमरत्व का, शाश्वत सुख और सनातन स्वरूप का भी चिंतन करे।।
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Saturday, January 20, 2024

हमारा व्यक्तिव ऐसे बनता हैं

हमारा व्यक्तित्व ऐसे बनता है "क्रिया स्थूल है और "ज्ञान" सूक्ष्म। क्रिया तक सीमित न रहकर, तत्त्वचिंतन की गहराई में उतरने के प्रयत्न में, हमें चैन और संतोष मिलता है। एक परत इससे भी गहरी है, जिसे "अंतरात्मा" कहते हैं। यहाँ आस्थाएँ रहती हैं। अपने संबंध में प्रिय और अप्रिय के, उचित और अनुचित के, आदतों और प्रचलनों के, पक्ष और सिद्धांतों के संबंध में अनेकानेक मान्यताएँ, इसी केंद्र में गहराई तक जड़ें जमाए बैठी रहती हैं। "व्यक्तित्व" का समूचा ढाँचा, यहीं विनिर्मित होता है। मस्तिष्क और शरीर को तो व्यर्थ ही दोष या श्रेय दिया जाता है। वे दोनों ही वफादार सेवक की तरह हर आत्मा की ड्यूटी ठीक तरह बजाते रहते हैं। उनमें अवज्ञा करने की कोई शक्ति नहीं। आस्थाएँ ही प्रेरणा देती हैं और उसी पेट्रोल से धकेले जाने पर जीवन स्कूटर के दोनों पहिये-चिंतन और कर्तृत्व सरपट दौड़ने लगते हैं। *व"व्यक्तित्व" क्या है-"आस्था"। मनुष्य क्या है-"श्रद्धा"। "चेष्टाएँ" क्या हैं-"आकांक्षा" की प्रतिध्वनि। गुण, कर्म, स्वभाव अपने आप न बनते हैं और न बिगड़ते हैं। "आस्थाएँ" ही आदतें बनकर परिपक्व हो जाती हैं तो उन्हें "स्वभाव" कहते हैं। अभ्यासों को ही "गुण" कहते हैं
        कर्म आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए शरीर और मन को संयुक्त रूप से जो श्रम करना पड़ता है, उसी को कर्म कहते हैं। इन तथ्यों को समझ लेने के उपरांत यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्तित्व के स्तर और उसकी प्रतिक्रिया के रूप में आने वाले सुख-दुःखों की अनुभूति होती रहती है। प्रसन्नता और उद्विग्नता को यों परिस्थितियों के उतार-चढ़ावों से जोड़ा जाता है, पर वस्तुत: वे मनःस्थिति के सुसंस्कृत और अनगढ़ होने के कारण सामान्य जीवन में नित्य ही आती रहने वाली घटनाओं से ही उत्पन्न अनुभूतियाँ भर होती हैं। *कोई घटना न अपने आप में "महत्त्वपूर्ण" है और न "महत्त्वहीन"। यहाँ सब कुछ अपने ढर्रे पर लुढ़क रहा है। सरदी-गरमी की तरह भाव और अभाव का, जन्म-मरण तथा हानि-लाभ का क्रम चलता रहता है। हमारे चिंतन का स्तर ही उनमें कभी प्रसन्नता अनुभव करता और कभी उद्विग्न हो उठता है। अनुभूतियों में परिस्थितियाँ नहीं, मन:स्थिति की भूमिका ही काम करती है।

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Friday, January 12, 2024

हमारे देश की महान सम्पदा अध्यात्म

       "अध्यात्म" भारत की महानतम संपत्ति है। उसे मानवता का मेरुदंड कहा जा सकता है। मनुष्य के भौतिक एवं आध्यात्मिक चिरस्थायी उत्कर्ष का एकमात्र आधार यही है। मनुष्य जाति की अगणित समस्याओं को हल करने और सुख-शांतिपूर्वक जीने के लिए "अध्यात्म" ही एकमात्र उपाय है। इस जीवनतत्त्व की उपेक्षा करने से पतन और विनाश का ही मार्ग प्रशस्त होता है। दुःख और दारिद्रय, शोक और संताप इसी उपेक्षा के कारण उत्पन्न होते हैं। मनुष्य के भविष्य को अंधकारमय बनाने वाला निमित्त इस उपेक्षा से बढ़कर और कोई नहीं हो सकता।
     "अध्यात्म" मानव जीवन के श्रेष्ठतम सदुपयोग की एक वैज्ञानिक पद्धति है। उसे जीवन जीने की विद्या भी कहा जा सकता है। छोटे- छोटे कार्यों की भी कोई प्रणाली एवं पद्धति होती है, उसी ढंग से चलने पर सफलता मिलती है। अस्त-व्यस्त ढंग से कार्य किया जाए तो लाभ के स्थान पर हानि ही होगी। मानव जीवन इस संसार का सर्वोत्कृष्ट वरदान है। भगवान के पास जो कुछ विभूतियाँ हैं, वे सभी मनुष्य शरीर में बीज रूप में भर दी हैं। ऐसे बहुमूल्य संयंत्र का सुसंचालन एवं सदुपयोग यदि प्राप्त न हो तो उसे एक दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। मानव जीवन एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं मूल्यवान क्रिया है।उसका विज्ञान एवं विधान जाने बिना या जानकर उस पर चले बिना यह आनंद और श्रेय नहीं मिल सकता जो मनुष्य जीवन जीने वाले को मिलना ही चाहिए।
     खेदपूर्वक यह स्वीकार करना होगा कि हमारे आलस्य और प्रमाद ने योग की उन उच्च स्तरीय विद्याओं को गंवा दिया। वैज्ञानिक शोध जैसी निष्ठा में संलग्न होने वाले साधक आज कहां ! जो हैं उन्हें बहुत कुछ मिलता भी है । जिनके आशीर्वाद प्राप्त करके मनुष्य अपना जीवन धन्य और सफल बना सके ऐसे ऋषि कल्प सत्पुरुष अभी भी मौजूद हैं

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Thursday, January 11, 2024

दोषों का परिमार्जन

दोषों का परिमार्जन
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से संभव है
       मनोविज्ञानी बताते हैं कि हर मनुष्य में अपनी विशेषता और बलिष्ठता सिद्ध करने की स्वाभाविक महत्वाकांक्षा होती है। उसे पूरा करने का सहज तरीका तो अपनी योग्यता एवम् सफलता सिद्ध करने का ही हो सकता है, पर इसके लिए जिस दृढ़ता, तत्परता और कुशलता की आवश्यकता होती है वह जुट नहीं पाती, ऐसी दशा में हानि पहुँचाने की क्षमता प्रदर्शित करने का आंतकवादी तरीका अपनाना पड़ता है। इसी में शौर्य, पराक्रम समझा जाता है। आक्रमण करके दूसरों को नीचा दिखाना और अपनी सामर्थ्य सिद्ध करना भी लड़ाइयों की तरह ही एक बड़ा कारण होता है। बहाना तो किसी छोटे-मोटे अप्रिय प्रसंग का ही ले लिया जाता है।अपराधियों की दुष्टताएँ इससे भिन्न हैं जो चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार की उद्दंडता बरतने और मर्यादाएँ तोड़ने के रूप में सामने आती रहती हैं। उनमें अर्थ लोभ एवं द्वेष बुद्धि की प्रधानता रहती है। दुस्साहस का अहंकार भी उसमें जुड़ा रहता है
         नई पीढ़ी के वैज्ञानिक कहते हैं कि युद्ध मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं है। स्वभावतः मनुष्य सामाजिक और सहयोगी प्रकृति का है, उसे सुविधा और खुशी चाहिए। युद्ध में आघात-प्रत्याघात से हर दृष्टि से हानि ही हानि उठानी पड़ती है। जीतने वाला भी घाटे में ही रहता है। ऐसी दशा में युद्ध को स्वाभाविक प्रकृति नहीं माना जा सकता, वह कुसंस्कारों एवं विकृत वातावरण की प्रतिक्रिया ही माना जा सकता है
          "अहमन्यता" का विकृत रूप उद्दंडता है, जिसकी ओछी पूर्ति दूसरों का तिरस्कार करके की जा सकती है। झगड़ालू स्वभाव में यही तथ्य काम करता है। यदि मनुष्य को आरंभ से ही शिष्टता, शालीनता, नम्रता और नागरिकता की शिक्षा दी जाए तो वह आक्रमण की अपेक्षा दूसरों की सहायता करने और बदले में श्रेय-सम्मान पाने की बात सोचेगा। ऐसी दशा में मतभेद और स्वार्थ विपर्यय होते हुए भी ऐसा मार्ग खोज लिया जाएगा, जिसमें झंझट कम खड़ा हो और गुत्थी शांति से सुलझ जाए।

Monday, January 8, 2024

आध्यात्मिक दृष्टि कोण

दोषों का परिमार्जन
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से संभव है
       मनोविज्ञानी बताते हैं कि हर मनुष्य में अपनी विशेषता और बलिष्ठता सिद्ध करने की स्वाभाविक महत्वाकांक्षा होती है। उसे पूरा करने का सहज तरीका तो अपनी योग्यता एवम् सफलता सिद्ध करने का ही हो सकता है, पर इसके लिए जिस दृढ़ता, तत्परता और कुशलता की आवश्यकता होती है वह जुट नहीं पाती, ऐसी दशा में हानि पहुँचाने की क्षमता प्रदर्शित करने का आंतकवादी तरीका अपनाना पड़ता है। इसी में शौर्य, पराक्रम समझा जाता है। आक्रमण करके दूसरों को नीचा दिखाना और अपनी सामर्थ्य सिद्ध करना भी लड़ाइयों की तरह ही एक बड़ा कारण होता है। बहाना तो किसी छोटे-मोटे अप्रिय प्रसंग का ही ले लिया जाता है।अपराधियों की दुष्टताएँ इससे भिन्न हैं जो चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार की उद्दंडता बरतने और मर्यादाएँ तोड़ने के रूप में सामने आती रहती हैं। उनमें अर्थ लोभ एवं द्वेष बुद्धि की प्रधानता रहती है। दुस्साहस का अहंकार भी उसमें जुड़ा रहता है
         नई पीढ़ी के वैज्ञानिक कहते हैं कि युद्ध मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं है। स्वभावतः मनुष्य सामाजिक और सहयोगी प्रकृति का है, उसे सुविधा और खुशी चाहिए। युद्ध में आघात-प्रत्याघात से हर दृष्टि से हानि ही हानि उठानी पड़ती है। जीतने वाला भी घाटे में ही रहता है। ऐसी दशा में युद्ध को स्वाभाविक प्रकृति नहीं माना जा सकता, वह कुसंस्कारों एवं विकृत वातावरण की प्रतिक्रिया ही माना जा सकता है
          "अहमन्यता" का विकृत रूप उद्दंडता है, जिसकी ओछी पूर्ति दूसरों का तिरस्कार करके की जा सकती है। झगड़ालू स्वभाव में यही तथ्य काम करता है। यदि मनुष्य को आरंभ से ही शिष्टता, शालीनता, नम्रता और नागरिकता की शिक्षा दी जाए तो वह आक्रमण की अपेक्षा दूसरों की सहायता करने और बदले में श्रेय-सम्मान पाने की बात सोचेगा। ऐसी दशा में मतभेद और स्वार्थ विपर्यय होते हुए भी ऐसा मार्ग खोज लिया जाएगा, जिसमें झंझट कम खड़ा हो और गुत्थी शांति से सुलझ जाए।

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Saturday, January 6, 2024

कर्म का फल भावना पर आधारित होता हैं

कर्म का फल भावना पर निर्भर है
         भीतरी दुनिया में गुप्त-चित्र, या चित्रगुप्त पुलिस और अदालत महकमों का काम स्वयं ही करता है। बाहरी दुनियाँ में तो यदि पुलिस झूठा सबूत दे दे तो अदालत का फैसला भी अनुचित हो सकता हैं, परन्तु भीतरी दुनियाँ में ऐसी गड़बड़ी की संभावना नहीं अन्तःकरण सब कुछ जानता है कि यह कर्म किस विचार से, किस इच्छा से, किस परिस्थिति में, क्यों कर किया गया था वहाँ बाहरी मन को सफाई या बयान देने की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि गुप्त मन उस बात के संबंध में स्वयं ही पूरी-पूरी जानकारी रखता है। हम जिस "इच्छा" से, जिस "भावना" से जो काम करते हैं उस "इच्छा" या "भावना" से ही पाप-पुण्य का नाप होता है
    भौतिक वस्तुओं की तौल नाप बाहरी दुनियाँ में होती है। एक गरीब आदमी दो पैसा दान करता है और एक धनी आदमी दस हजार रुपया दान करता है बाहरी दुनियाँ तो पुण्य की तौल रुपये-पैसों की गिनती के अनुसार करेगी दो पैसा दान करने वाले की ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देखेगा, पर दस हजार रुपया देने वाले की प्रशंसा चारों ओर फैल जायेगी। भीतरी दुनियाँ में यह तौल-नाप नहीं चलती बाहर की दुनियाँ में रुपयों की गिनती से, काम के बाहरी फैलाव से, कथा-वार्ता से, तीर्थयात्रा आदि भौतिक चीजों से यश खरीदा जाता है, पर चित्र गुप्त देवता के देश में यह सिक्का ही नहीं चलता, वहाँ तो इच्छा और भावना की नाप-तौल है उसी के मुताबिक पाप-पुण्य का जमा- खर्च किया जाता है भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उकसा कर लाखों आदमियों को महाभारत के युद्ध में मरवा डाला लाशों से भूमि पट गई, खून की नदियाँ बह गई फिर भी अर्जुन को कोई पाप नहीं लगा अर्जुन का उद्देश्य पवित्र था, वह पाप को नष्ट करके धर्म की स्थापना करना चाहता था बस वही इच्छा खुफिया रजिस्टर में दर्ज हो गई आदमियों के मरने जीने की संख्या का कोई हिसाब नहीं लिखा गया। दुनियाँ में करोड़पति की बड़ी प्रतिष्ठा है, पर यदि उसका दिल खोटा है तों चित्रगुप्त के दरबार में भिखमंगा शुमार किया जायगा। दुनियाँ का भिखमंगा यदि दिल का धनी है तो उसे बादशाह गिना जायगा इस प्रकार मनुष्य जो भी काम कर रहा है वह किस नीयत से कर रहा है, वह नीयत, भलाई या बुराई, जिस दर्जे में जाती होगी उसी में दर्ज कर ली जायगी सद्भाव से फाँसी लगाने वाला एक जल्लाद भी पुण्यात्मा गिना जा सकता है और एक धर्मध्वजी तिलकधारी पण्डित भी गुप्त रूप से दुराचार करने पर पापी माना जा सकता है बाहरी आडम्बर का कुछ मूल्य नहीं है, कीमत भीतरी चीज की है सीप की कुछ कीमत नहीं, मोल-तोल तो मोती का है। बाहर से कोई काम भला या बुरा दिखाई दे, तो उससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। असली तत्व तो उस "इच्छा" और "भावना" में है, जिससे प्रेरित होकर वह काम किया गया है पाप-पुण्य की जड़ कार्य और प्रदर्शन में नहीं, वरन् निश्चित रूप से "इच्छा" और "भावना" में ही है।

Friday, January 5, 2024

जागरूक व्यक्ति युग की पुकार सुनें

जागरूक व्यक्ति युग की पुकार सुनें
          ईश्वरीय शक्ति का अवतरण प्राकट्य हर ऐसे संधिकाल में होता है, जब परिवर्तन के अलावा कोई उपाय नहीं रह जाता। उसके स्वरूप और क्रिया- कलाप में हेर-फेर अवश्य होता रहता है। हिरण्याक्ष राक्षस जब धरती को समुद्र में ले जाकर छिप गया तो भगवान को वाराह का रूप धारण करना पड़ा। हिरण्यकशिपु को वरदान था कि वह न मनुष्य से मारा जा सकेगा और न पशु से, न घर में मारा जा सकेगा और न बाहर, न मल्ल युद्ध में मारा जा सकेगा न शस्त्र युद्ध में। इसलिए भगवान को मनुष्य और सिंह का सम्मिलित रूप धारण कर देहरी में नखों को शस्त्र की तरह उपयोग कर हिरण्यकशिपु का संहार करना पड़ा। इसी प्रकार आतताइयों का संहार करने के लिए परशुराम, मर्यादा की स्थापना के लिए राम, योग का कर्म प्रधान रूप प्रस्तुत करने के लिए कृष्ण और बौद्धिक क्रांति के लिए बुद्ध को अवतरित होना पड़ा। इस अवतरण प्रक्रिया में कहीं भी जड़ता नहीं है, अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना ही प्रधान लक्ष्य रहा है।*

      *आज की परिस्थितियाँ भिन्न हैं। पहले असुरता सीधे आक्रमण करती थी और समाज व्यवस्था को अस्त-व्यस्त, तहस-नहस करती थी। आज असुरता ने छद्म आक्रमण की नीति अपनाई और वह जनमानस में विकृतियाँ उत्पन्न कर रही है। आदर्शों और मर्यादाओं की अवज्ञा इस व्यापक स्तर पर होने लगी है कि उनके लिए कटिबद्ध व्यक्ति अपवाद बनते चले जा रहे हैं। ईश्वर के अस्तित्व को मानने और देवस्थानों पर प्रतिमा के सामने सिर झुकाने वालों का अभाव नहीं है। अभाव है उन व्यक्तियों का जिन्हें सच्चे अर्थों में आस्तिक कहा जा सके। ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करने वाला उतना नास्तिक नहीं है, जितना कि उसे मानते हुए भी आदर्शों और मर्यादाओं की अवज्ञा करने वाला। फलत: इन दिनों चारों ओर जितने भी संकट, जितनी भी समस्याएँ दिखाई देती हैं, उनके मूल को खोजें तो विदित होगा कि आज का संकट आस्थाओं का संकट है।
     इस बार नवयुग की, "युग गायत्री" की अवतरण प्रक्रिया भी असुरता के उन्मूलन और देवत्व के उदय के सनातन उद्देश्य से पूर्ण है। परिस्थितियों के अनुरूप उस चेतना के उदय हेतु प्रयासों का स्वरूप भी भिन्न होगा। अवांछनीयता, असुरता को निरस्त करने का यह धर्म युद्ध धर्मक्षेत्र में, अंत:करण की गहराई में उतरकर लड़ा जाना है और जनमानस के परिष्कार द्वारा आस्थाओं के परिशोधन द्वारा नवयुग के निर्माण में ग्वाल-वालों की रीछ-वानरों की भूमिका निभाने के लिए हर जागरूक व्यक्ति को आगे आना है।

पढ़ते रहे ब्लॉग #जनयुग के प्रहरी 

समय का चक्र और संघर्ष की कहानी

जनयुग के प्रहरी में आप पढ़े 😊 समय का चक्र और अज्ञातवास की कहानी, संघर्ष की कहानी  समय का पहिया घूमता रहता है, और हमें अपने जीवन में कई बार ...