Friday, December 29, 2023

अध्यात्म विज्ञान

"अध्यात्म विज्ञान" जीवन जीने की सर्वोत्कृष्ट विद्या
अध्यात्म विज्ञान, आध्यात्मिक साधनाएँ इतनी सामर्थ्यवान, प्रभावशाली हैं कि उनके द्वारा भौतिक विज्ञान से अधिक महत्त्वपूर्ण सफलताएँ उपलब्ध की जा सकती हैं, हमारे देश में अनेक ऋषियों- महर्षियों, संत-महात्माओं, योगी-यतियों का जीवन इसका प्रमाण है, बिना साधनों के उन्होंने आज से हजारों वर्ष पूर्व अंतरिक्ष, पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा आदि के संबंध में अनेकों महत्त्वपूर्ण तथ्य खोज निकाले थे। अनेकों विद्याएँ, कला-कौशल, ज्ञान-विज्ञान में उनकी गति असाधारण थी। बड़े-बड़े राजमुकुट उनके पैरों में झुकते थे लेकिन अपनी अध्यात्म साधना के समक्ष वे सब कुछ महत्त्वहीन समझते थे और निरंतर अपने ध्येय में संलग्न रहते थे
          आज उन्हीं अध्यात्मवेत्ताओं के देश में इस महान विज्ञान की जितनी दुर्गति हुई है, उस पर किसी विचारशील व्यक्ति का दु:खी होना स्वाभाविक ही है "अध्यात्म विज्ञान" के प्रति आजकल हमारे मूल्यांकन की कसौटी, परिचयप्राप्ति के ढंग इतने बदल से गए हैं कि हम अध्यात्म विद्या से बहुत दूर भटक गए हैं इसके वास्तविक मर्म को न जानने के कारण अध्यात्म के नाम पर बहुत से लोग जीवन के सहज पथ को छोड़कर अप्राकृतिक, असामाजिक, उत्तरदायित्वहीन जीवन बिताने लग जाते हैं गलत, अस्वाभाविक जीवनक्रम के कारण कई बार शारीरिक अथवा मानसिक रोगों से पीड़ित हो जाते हैं
        आज आध्यात्मिक जीवन बिताने का अर्थ जनसाधारण में लोक- जीवन को उपेक्षित मानने से होता है अकसर लोगों में यह धारणा भी कम नहीं फैली है कि "यह संसार क्षणभंगुर" है, "माया है" "इसका त्याग करने पर ही मोक्ष-कल्याण की मंजिल प्राप्त हो सकती है" इसी धारणा से प्रेरित होकर बहुत से लोग अपना कर्त्तव्य, अपनी जिम्मेदारियाँ छोड़ बैठते हैं, अपना घर-बार छोड़ बैठते हैं, लेकिन यदि घर-गृहस्थी को छोड़ना, अपने कर्त्तव्यों से मुँह मोड़ना ही आध्यात्मिक पथ पर बढ़ने का प्रथम चिह्न है तो आध्यात्मिक इतिहास से सारे ऋषियों को हमें हटाना पड़ेगा,क्योंकि प्रायः महर्षि गृहस्थ थे, जनसाधारण का स्वाभाविक सहज जीवन बिताते थे, गुरुकुल पाठशालाएँ चलाते थे, जनता के धर्मशिक्षण का दायित्व पूरी तरह निभाते थे
       जो लोक जीवन को पुष्ट न कर सके, जो व्यक्ति का सर्वांगीण विकास न साध सके, जो जग पथ पर चलते हुए मनुष्य को शक्ति प्रेरणा न दे सके, जो मनुष्य को व्यावहारिक राजमार्ग न दिखा सके, वह अध्यात्म विज्ञान हो ही नहीं सकता।।

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Tuesday, December 26, 2023

मानव जीवन की उत्कृष्टता

मानव-जीवन को उत्कृष्टता की-पूर्णता की-लक्ष्य प्राप्ति की  अंतिम मंजिल तक पहुँचाने का एकमात्र उपाय "अध्यात्म" ही है। इससे लोक और परलोक की सार्थकता सुनिश्चित होती है। परलोक में स्वर्ग और मुक्ति का लाभ उसे ही मिलता है, जो अपने अंतःकरण को "आध्यात्मिक" आदर्शों के अनुरूप ढाल लेने में सफल होता है।
           आत्म-साक्षात्कार, ईश्वर-दर्शन एवं ब्रह्म प्राप्ति की उपलब्धि का एक ही मार्ग है कि आत्मा पर चढ़े मल-आवरण विक्षेपों को हटाकर उसे शुद्ध स्वरूप में विकसित किया जाए। लौकिक जीवन का प्रत्येक क्षेत्र उसी के लिए मंगलमय बनता है, जिसने अपने गुण, कर्म, स्वभाव एवं दृष्टिकोण को परिष्कृत कर लिया है। श्रेय पथ पर चलने वाले लोग ही महापुरुष बनते हैं और इतिहास में अपना अनुकरणीय आदर्श छोड़ जाते हैं। यश शरीर को अमर बनाने का सौभाग्य ऐसे ही लोगों को मिलता है।
        सुदृढ़ स्वास्थ्य, समर्थ मन, स्नेह-सहयोग, क्रिया-कौशल, समुचित धन, सुदृढ़ दांपत्य,  सुसंस्कृत संतान, प्रगतिशील विकास-क्रम, श्रद्धा-सम्मान, सुव्यस्थित एवं संतुष्ट जीवन का आधार केवल एक ही है- "अध्यात्म"। "अपने को सुधारने से संसार सुधार जाता है।"
           अपने को ठीक कर लेने से चारों ओर का वातावरण बनने में देर नहीं लगती। यह एक निश्चित तथ्य है कि जो अपने को सुधार न सका, अपनी गतिविधि को सुव्यवस्थित न कर सका उसका इहलौकिक और पारलौकिक भविष्य अंधकारमय ही बना रहेगा। जो इस लोक को नहीं संभाल सका, उसका परलोक क्या संभलेगा ? जो इस जीवन में नारकीय मनोभूमि लिए बैठा है, उसे परलोक में स्वर्ग मिलेगा, ऐसी आशा करता व्यर्थ है। "स्वर्ग" की रचना इसी जीवन में करनी पड़ती है, दुष्प्रवृत्तियों के भव-बंधनों से इसी जीवन में मुक्त होना पड़ता है। परलोक में यही सफलताएँ साकार बन जाती हैं । इसीलिए मनीषियों ने मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता उसकी "आध्यात्मिक" प्रवृत्ति को ही माना है।

Monday, December 25, 2023

हमें हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए

इंसान को हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए
         बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति को सफ़ल होने के लिए स्वयं पर भरोसा और अपनी क्षमताओं की पहचान होना बहुत आवश्यक हैं। यदि हमें स्वयं पर भरोसा और अपनी क्षमताओं की जानकारी नहीं है, तो हम स्वयं का छोटा सा भी काम नहीं कर सकते। किसी के भी हालात कभी एक जैसे नहीं रहते। हमेशा यदि सुख नहीं रहता तो दुःख भी नहीं रहता. इसलिए कहते हैं कि जीवन किसी भी पल बदल सकता है। कभी कभी ऐसी स्थितियां बन जाती हैं जिसके कारण हमारा पूरा जीवन ही बदल जाता है, इसलिए हमें प्रत्येक परिस्थितियों के लिए तैयार रहना चाहिए।
       नदी भी हमें यही सन्देश देती है कि हर परिस्थितियों में आगे बढ़ते रहो। राहों में यदि चट्टान रूपी समस्याएं भी आ जाएं, तो हमें चाहे अपना रास्ता बदलना पड़े लेकिन आगे बढ़ना नहीं छोड़ना चाहिए। समस्याओं से लड़कर हमें जो सीख मिलती है, वैसी सीख हमें किसी भी विद्यालय से प्राप्त नहीं हो सकती।
         समस्याओं से मिली किसी भी सीख को यदि हम याद रखते हैं और भविष्य में उसे नहीं दोहराते हैं, तो हमारे जीवन में सुख शान्ति और सफलता बनी रहती है। जो लोग स्वयं की भूलों को स्वीकार कर लेते हैं, वो अपने जीवन में बहुत कुछ अच्छा और सकारात्मक सीख लेते हैं।

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Saturday, December 23, 2023

कठिनाइयां हमे सचेत करती हैं

कठिनाइयां हमें सचेत करने जीवन में आती हैं

           बबूल के बीज बोने पर काँटेदार वृक्ष का पैदा होना निश्चित है। किसी भी तरह का अनैतिक बुरा कार्य करने पर शारीरिक अवज्ञा, मानसिक रोग या किसी बाह्य दंड विपत्ति का सामना करना पड़े तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। नियतिचक्र, नैतिक मर्यादाओं के विरुद्ध आचरण करने पर मनुष्य का मनोबल क्षीण हो जाता है। कई तरह के कुविचार, कुकल्पनाएँ, उसके मन में घुस जाती हैं जिनसे बाह्य जीवन भी प्रभावित होता है और उसके फलस्वरूप कई दुष्परिणाम मिलते हैं। मानसिक द्वंद्वों में मनुष्य घुल-घुलकर विनाश को प्राप्त होने लगता है। अनैतिक आचरण से मनुष्य का विवेक, नैतिक बुद्धि प्रबल नहीं होती और उसे उचित-अनुचित का भी ध्यान नहीं रहता। फलस्वरूप गलत निर्णय होते हैं और इससे मनुष्य भयंकर दुःखद परिस्थितियों में पड़ जाता है।

       इसका यह भी अर्थ नहीं कि विश्वनियामक विधान की मर्यादा तोड़ने वाले मनुष्यों से कोई दुश्मनी हो। यह सुधारात्मक संतुलन पैदा करने वाला तत्त्व है। जिस तरह किसी रोग के बाह्य लक्षण उस रोग को प्रकृति द्वारा शरीर से बाहर निकालने का प्रयत्न है, उसी तरह नियतिचक्र के विरुद्ध आचरण करने से मिलने वाला शारीरिक या मानसिक दंड अनैतिक कार्य करने वाले को उस ओर से विरत करने के लिए ही एक प्रयत्न है। अभिमानी, दुराचारी अपनी असहाय दीन अवस्था में अपने अनैतिक कार्यों के लिए बहुत पश्चात्ताप करते हैं। नियति की ठोकर खाकर ही मनुष्य को कुछ होश आता है और वह अपने दुष्कर्मों के बारे में समझने  लगता है। भविष्य में ऐसा न करने का संकल्प भी करता है। खासकर परेशानी की स्थिति में तो वह दुष्कर्म नहीं ही करता। ऐसी स्थिति में कई सुधार भी किए जाते हैं, अनैतिक कार्य छोड़ देते हैं। विश्वनियामक सत्ता का अनुभव करने लगते हैं और उन्हें यह सोचने को बाध्य होना पड़ता है कि कोई सत्ता हमसे भी प्रबल है जो हमारे कर्मों का लेखा-जोखा लेती है। इतिहास साक्षी है कि जब नियति की ठोकर लगी, विश्व-विधान के अनुसार प्रतिक्रिया पैदा हुई, तो बड़े-बड़े महारथी, दिग्गज बलवानों को यह सोचने के लिए मजबूर होना पड़ा कि कोई हमसे भी शक्तिशाली सत्ता है जो हमारा लेखा-जोखा लेती है। उनका गर्व काफूर हो गया।

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Monday, December 18, 2023

अध्यात्मवादी बनो



  हमारा दृष्टिकोण अध्यात्मवादी बने

        कितना ही "धन" कमा लिया जाए, कितनी ही "विद्या" प्राप्त कर ली जाय, कितनी ही "शक्त्ति" संचय कर ली जाए तब भी संसार के दुःखों से सर्वथा मुक्ति नहीं पायी जा सकती। धन अभावों, आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। विद्या, बौद्धिक विकास कर सकती है और शक्ति से किन्हीं दूसरों को वश में किया जा सकता है, किंतु इस प्रकार की कोई सफलता दुःखों से मुक्ति नहीं दिला सकती। धनवानों को दुःख होता है,विद्वान् शोक मनाते देखे जाते हैं और शक्तिमानों को पराजित होते देखा गया है।
         धन हो और विद्या न हो तो जड़ता से मिलकर धन विनाश का हेतु बन जाता है। विद्या हो पर स्वास्थ्य न हो तो विद्या का कोई  समुचित उपयोग संभव नहीं। दिन-रात स्वास्थ्य की चिंता लगी रहेगी। थोड़ा काम किया नहीं कि कभी सिर दर्द है तो कभी अजीर्ण हो गया, कभी सर्दी है तो कभी ज्वर घेर रहा है। इस प्रकार न जाने कितनी बाधायें और व्याधायें लगी रहती हैं। केवल विद्या के बल पर उनसे छुटकारा नहीं मिल पाता। इस प्रकार शक्ति तो हो पर धन और विद्या न हो तब भी पग-पग पर संकट खड़े रहते हैं। धन के अभाव में शक्त्ति निष्क्रिय रह जाती है और यदि उसके बल पर धन संचय भी कर लिया जाये तो विद्या के अभाव में उसका कोई समुचित उपयोग नहीं किया जा सकता।
        विद्यारहित शक्ति भयानक होती है। मनुष्य को आततायी, अन्यायी और अत्याचारी बना देती है। ऐसी अवस्था में संकटों का पारावार नहीं रहता। धन, विद्या और शक्ति तीनों वस्तुयें संसार में किसी को कदाचित् ही मिलती है।
        यदि एक बार यह तीनों वस्तुयें किसी को मिल भी जाएँ तो हानि-लाभ, वियोग-विछोह, ईर्ष्या-द्वेष आदि के न जाने कितने कारण मनुष्य को दुखी और उद्विग्न करते रहते हैं। ऐसा नहीं हो पाता कि धन, विद्या और शक्ति को पाकर भी मनुष्य सदा सुखी, संतुष्ट एवं शात बना रहे। संसार की कोई भी ऐसी उपलब्धि नहीं, जिसके मिल जाने से मनुष्य दुख-क्लेशों की ओर से सर्वथा निश्चित हो जाये
        मनुष्य जीवन का लक्ष्य "आनंद" की प्राप्ति ही है। उसी को पाने के लिए सारे प्रयत्न किये जाते हैं। भौतिक विभूतियों की सहायता से वह मिल नहीं पाता। मनुष्य दुःखी तथा उद्विग्न बना रहता है। तब कौन-सा उपाय हो सकता है, जिसके आधार पर इस असफलता को सफलता में बदला जा सके ? उसका एकमात्र उपाय यदि कोई है तो वह है 'अध्यात्म'। "अध्यात्म" की महिमा अपार है। उसके द्वारा प्राप्त होने वाले अहेतुक सुख की तुलना संसार की किसी भी विभूति से मिलने वाले क्षणिक सुख से नहीं की जा सकती। मानव-জীবন की सर्वोत्कृष्ट विभूति वही है। उसकी सहायता से मनुष्य देवताओं की भाँति सदा आनंदित रह सकता है।देवत्व प्राप्त हो जाने पर दु:ख की संभावना ही समाप्त हो जाती है।

Sunday, December 17, 2023

मिथ्या चिन्तन को त्यागें


  मिथ्या चिंतन को त्यागें
     आत्म - लाभ पाएँ
      शरीर को भोग का साधन मानना एक अकल्याण दृष्टिकोण है, अनाध्यात्मिक भाव है। इसी के कारण ही तो आज हम सब पतन के गर्त में गिरे हुए शोक-संतापों और दुःख-क्लेशों  में फंसे हुए हैं। शरीर, आध्यात्मिक साधना का एक महान् माध्यम है। इसी की सहायता से आत्मा का ज्ञान और परमात्मा का साक्षात्कार होता है। इसे संसार के अपवित्र भोगों में लिप्त कर डालना अकल्याणकर प्रमाद है, जिसे कभी भी न करना चाहिये। शरीर को भगवान का  मंदिर समझकर "आत्म-संयम" तथा "अध्यात्म साधना" द्वारा श्रेय पथ पर बढ़ना चाहिये।
      अनात्म भाव के कारण ही शरीर "साध्य" बना हुआ है, अन्यथा यह एक चमत्कारी "साधन" है, जिसका सदुपयोग कर इसी जीवन में आत्मा को पाया और परमात्मा का साक्षात्कार किया जा सकता है। शरीर को अपनी संपत्ति मानकर भोग-विलासों में लगाये रहना अहंकार है। वस्तुतः शरीर आत्मा की संपत्ति है, उसका ही उपादान है, अस्तु इसे ऐसे साधनों में ही लगाया जाना चाहिए, जिससे भव-बंधन में आबद्ध आत्मा मुक्त हो और जीवन शाश्वत सुख का लाभ प्राप्त हो।
      भव-रोगों में फँसे मनुष्यों की इस पतितावस्था से उद्धार का  एक ही मार्ग है और वह है "अध्यात्मवाद"। भौतिकवाद के उन्माद ने  आज मानव जाति को उन्मत्त बना रखा है। वह कल्याण के ज्ञान से सर्वथा रिक्त होती जा रही है। आज लोगों की मनोभूमियाँ इस सीमा तक दूषित हो गई हैं कि अमंगल में मंगल दीखने लगा है। मानसिक विकारों, आवेगों, प्रलोभनों और पाप पर नियंत्रण कर सकना उनके लिए कठिन हो गया है। तनिक-सा प्रलोभन सामने आते ही पाप करने को उद्यत हो जाना, जरा-सा भय उपस्थित होते ही कर्तव्य-पथ का त्याग कर देना साधारण बात बन गई है।
          चित्त की अस्थिरता और जीवन की निरुद्देश्यता ने लोगों को विक्षिप्त बना रखा है। ऐसी भयानक मनोभूमि और ऐसे पापपूर्ण व्यवहार के रहते हुए कैसे आशा की जा सकती है कि मनुष्य अपने जीवन लक्ष्य परमानंद को प्राप्त कर सकता है। इन सब विकारों और विपरीतताओं का एकमात्र कारण है- "अध्यात्मवाद" की उपेक्षा। यदि "संसार" के साथ "आत्मा" का भी ध्यान रखा जाये, उसके विकास और मुक्ति का प्रयत्न करते रहा जाये तो शीघ्र ही इन सारे भव-रोगों से मुक्त होकर मनुष्य आनंद की ओर अग्रसर हो चले। "आत्म-लाभ" ही सर्वश्रेष्ठ लाभ माना गया का है, उसी को प्राप्त करना श्रेय है और उसी को पाने के लिए प्रयत्न भी किया जाना चाहिए।

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समय का चक्र और संघर्ष की कहानी

जनयुग के प्रहरी में आप पढ़े 😊 समय का चक्र और अज्ञातवास की कहानी, संघर्ष की कहानी  समय का पहिया घूमता रहता है, और हमें अपने जीवन में कई बार ...