Tuesday, February 20, 2024

दाम्पत्य जीवन प्रगति रथ के दो पहिए

"दाम्पत्य जीवन" के ऊपर पारिवारिक, सामाजिक, व्यक्तिगत सभी तरह की उन्नति और विकास निर्भर करते हैं। पति-पत्नी के सहयोग, एकता, परस्पर आत्मोत्सर्ग, त्याग-सेवा आदि से दाम्पत्य जीवन की सुखद और स्वर्गीय अनुभूति सहज ही की जा सकती है इससे मनुष्य के आंतरिक और बाह्य जीवन के विकास में बड़ा योग मिलता है सभी भाँति, स्वस्थ, संतुलन, सुन्दर दाम्पत्य जीवन स्वर्ग की सीढ़ी है और मानव विकास का प्रेरणा-स्रोत है
       जीवन लक्ष्य की लम्बी मंजिल को तय करने के लिए पति-पत्नी का अनन्य संयोग यात्रा को सहज और सुगम बना देता है नारी शक्ति है तो पुरुष पौरुष बिना "पौरुष" के शक्ति व्यर्थ ही धरी रह जाती है तो बिना "शक्ति" के "पौरुष" भी किसी काम नहीं आता। वह अपंग है। "शक्ति" और "पौरुष" का समान प्रवाह, संयोग, एकता नवसृजन के लिए, नव-निर्माण के लिए आवश्यक है।इनकी परस्पर असंगति, असमानता ही अवरोध, हानि, अवनति का कारण बन जाती है। पति-पत्नी में यदि परस्पर विग्रह, आपाधापी, स्वार्थपरता, द्वेष, स्वेच्छाचार की आग सुलग जायेगी तो दाम्पत्य जीवन का सौन्दर्य, विकास, प्रगति महत्त्वपूर्ण संभावनाओं का स्वरूप अपने गर्भ में ही नष्ट हो जायेगा
       पति-पत्नी संसार-पथ पर चलने वाले जीवन-रथ के दो पहिये हैं, जिनमें एक की स्थिति पर दोनों की गति-प्रगति निर्भर करती है। दोनों का चुनाव जितना ठीक होगा उतना ही सुखद, स्वर्गीय, उन्नत और प्रगतिशील बनेगा दोनों में से एक भी अयोग्य-कमजोर हो तो दाम्पत्य जीवन का रथ डगमगाने लगेगा और पता नहीं वह कहीं भी दुर्घटनाग्रस्त होकर नष्ट-भ्रष्ट हो फिसल जाये अथवा मार्ग में ही अटक जाये इससे न केवल पति-पत्नी वरन परिवार-समाज के जीवन में गतिरोध पैदा होगा, क्योंकि "दाम्पत्य जीवन" पर ही "परिवार" का भवन खड़ा होता है और "परिवार" से ही "समाज" बनता है, इसलिए पति-पत्नी का चुनाव एक महत्त्वपूर्ण पहलू है
     बड़ी-बड़ी आशा-आकांक्षाओं के साथ नवयुवक और नवयुवतियाँ दाम्पत्य जीवन के सूत्र में बँधते हैं बड़ी-बड़ी रस्में अदा होती हैं, विवाह के रूप में बड़ा समारोह मनाया जाता है गाजे-बाजे, रोशनी, दावतों, लेन-देन, बरात, जुलूस आदि के साथ दो प्राणी विवाह-सूत्र में बँधते हैं। परस्पर के नये आकर्षण से प्रारम्भिक दिनों दोनों का जीवन बड़ा सुखद दीखता है किन्तु यह स्थिति अधिक दिन तक नहीं रहती और दाम्पत्य-जीवन कलह, अशांति, द्वेष, असन्तोष की आग में जलने लगता है
       परिपाटी के तौर पर जो प्रतिज्ञाएँ धर्म पुरोहित उच्चारण कर देते हैं, उनका व्यावहारिक जीवन में नाम भी नहीं रहता दाम्पत्य जीवन एक-दूसरे के लिए बोझा बन जाता है इसका कोई बाह्य कारण नहीं अपितु पति-पत्नी दोनों के ही परस्पर व्यवहार-आचरणों में विकृति पैदा होने पर ही अक्सर ऐसा होता है। यदि इन छोटी-छोटी बातों में सुधार कर लिया जाये तो दाम्पत्य जीवन परस्पर सुख, शांति, आनन्द का केन्द्र बन जाये।।


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Tuesday, February 6, 2024

कठिनाईयो को अधिक न आंके

अपनी कठिनाइयों को  अधिक न आंके जीवन को शांतिपूर्ण रीति से व्यतीत करने का तरीका यह है कि हम अपनी कठिनाइयों का मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर न आँकें। वरन उतना ही समझें जितनी कि वे वास्तव में हैं इससे हमारी अनेक दुश्चिंताएँ, आसानी से नष्ट हो सकती हैं
        एक विद्यार्थी परीक्षा में अनुत्तीर्ण होता है फेल होने के समाचार से उसका मानसिक संतुलन डगमगा जाता है वह इस असफलता को वज्रपात जैसी मानता है सोचता है सारी दुनिया मुझे धिक्कारेगी, मूर्ख या आलसी समझेगी, मित्रों के सामने मेरी सारी प्रतिष्ठा धूल में मिल आएगी, अभिभावक कटु शब्द कहकर मेरा तिरस्कार करेंगे, यह कल्पना उसे असह्य लगती है, चित्त में भारी क्षोभ उत्पन्न होता है और रेल के आगे कटकर, नदी में कूदकर या और किसी प्रकार वह अपनी आत्महत्या कर लेता है, घरभर में कुहराम मच जाता है, वृद्ध माता-पिता रो-रोकर अंधे हो जाते हैं एक उल्लासपूर्ण हँसते-खेलते घर का वातावरण शोक, क्षोभ और निराशा में परिणत हो जाता है इस विपन्न स्थिति को उत्पन्न करने में सारा दोष उस गलत दृष्टिकोण का है जिसके अनुसार एक छोटी-सी असफलता को इतना बढ़ा- चढ़ाकर आंका गया
       एक दूसरा विद्यार्थी भी उसी कक्षा में अनुत्तीर्ण होता है उसे भी दुःख तो होता है, पर वह वस्तुस्थिति का सही मूल्यांकन कर लेता है और सोचता है कि इस वर्ष बोर्ड का परीक्षाफल 43 प्रतिशत ही तो रहा है, मेरे समान अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या 57 प्रतिशत है। वर्तमान परिस्थितियों में अनुत्तीर्ण होना एक साधारण-सी बात है, इसमें सदा विद्यार्थी ही दोषी नहीं होता, वरन प्राय: शिक्षकों की उदासीनता, बिना पढ़े हुए विषयों के परचे आ जाना और नंबर देने वालों की लापरवाही भी उसका कारण होती है, इस वर्ष अनुत्तीर्ण हो गए तो अगले वर्ष अधिक परिश्रम करने से अच्छी डिवीजन में उत्तीर्ण होने की आशा रहेगी, आदि बातों से अपने मन को समझा लेता है और अनुत्तीर्ण होने की खिन्नता को जल्दी ही अपने मन से हटाकर आगे के कार्यक्रम में लग जाता है
      दोनों ही छात्र एक ही समय एक ही कक्षा में अनुत्तीर्ण हुए थे एक ने आत्महत्या कर ली, दूसरे ने उस बात को मामूली मानकर अपना साधारण क्रम जारी रखा फेर केवल  समझ का था परिस्थिति का नहीं, यदि परिस्थिति का होता तो दोनों को समान दुःख होना चाहिए था और दोनों को आत्महत्या करनी चाहिए थी, पर ऐसा होता नहीं, इससे स्पष्ट है कि परिस्थितियों के मूल्यांकन में गड़बड़ी होने से मानसिक संतुलन बिगड़ा और उसी से दुर्घटना घटित हुई।

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समय का चक्र और संघर्ष की कहानी

जनयुग के प्रहरी में आप पढ़े 😊 समय का चक्र और अज्ञातवास की कहानी, संघर्ष की कहानी  समय का पहिया घूमता रहता है, और हमें अपने जीवन में कई बार ...