Monday, July 22, 2024

वार्तालाप में विनयशीलता

वार्तालाप में "विनयशीलता" कमजोरी की निशानी नहीं है। उसके साथ "शालीनता" की परंपरा भी जुडी होती है। वृक्ष जब फलों से लदते है. तो उनकी डालियाँ झुक जाती हैं। अरंड का पेड अकड़ा-तना रहता है. क्योंकि उसे अपनी ऊँचाई भर का ज्ञान होता है,  वह  भूल जाता है कि उसकी डाली से न किसी का पेट भरता है और न उसके नीचे कोई विश्राम कर पाता है। नदियाँ जमीन से गहरी होती है इसलिए उनमें इर्द-गिर्द के अनेक प्रवाह मिलते चले जाते हैं। जो जितना "उथला" होगा वह उतना ही उफन कर चलेगा,गहरी नदियाँ ही दूर-दूर तक का पानी अपनी ओर खींचती और उदरस्थ करती रहती हैं। "सज्जनोचित" "मधुर वाणी" में ऐसा ही चुंबकत्व है, जो अपरिचितों को ही नहीं, विरोधियों को भी अपना बना लेती है। इसके विपरीत कटुभाषी अकारण, अपरिचितों से भी बैर मोल लेता रहता है उनके मित्रों की संख्या निरंतर घटती और शत्रुओं की बढ़ती जाती है। वे इसका दोष यों दूसरों पर ही थोपते हैं, पर यथार्थता यह नही है। भौरे मकरंद पान करते हैं। मधुमक्खियाँ शहद बटोरती हैं। "तितलियाँ" आजीवन कला और सौंदर्य के साथ विचरण करती हैं, जबकि उसी बाग में गुबरीला कीड़ा मात्र सड़े गोबर को खोजता तथा मिलने पर उसी की दुर्गंध में रमता है और उसी स्तर का बनता जाता है। हाट में हर प्रकार की वस्तुएँ बिकती हैं, पर ग्राहक अपनी मर्जी का ही माल खरीदता है। संसार के बाजार में बुरा भी मौजूद है भला भी, पर दुर्बुद्धि को तो मात्र कुरूपता ही दीखती है और वह उसी को कोसते हुए अपनी निकृष्टता उजागर करती रहती है। इस संदर्भ में कौन किस मनःस्थिति में है, इसका परिचय करना हो, तो उसकी वाणी कुछ देर ध्यानपूर्वक सुननी चाहिए। उससे सहज जाना जा सकता है कि किसी उजड्ड से पाला पड़ा या सज्जन के साथ ? अन्य गुण चाहे हो या न हो, पर इस कौशल को सीखा ही जाना चाहिए कि "मधुर" व्यवहार से हर किसी के मन में अपने लिए जगह किस प्रकार बनाई जाए ? स‌द्भाव का इत्र छिड़ककर किस प्रकार संबद्ध वातावरण को सुगंध से महकाया जाए ? "मधुर" वाणी इन सत्प्रयोजनों को सहज ही पूरा करती रहती है।*
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