Thursday, October 9, 2025

परिस्थितिया हमें सजग करती हैं

जनयुग के प्रहरी में आप पढ़े
 *प्रतिकूल परिस्थितियां*
*हमें सजग करने आती हैं*
     *संसार की प्रत्येक घटना, क्रिया-कलापों का संचालन एक नियम, विधान के अनुसार ही होता है, जिसे प्राकृतिक, ईश्वरीय विधान कुछ भी कहें। इस विधान की प्रेरणा से सृष्टि का जर्रा-जर्रा गतिशील है, इस विधान के अनुकूल चलने पर ही सुख, सुविधा, सहयोग, प्रगति, विकास निश्चित है । इतना ही नहीं उस दिशा में मनुष्य प्रयत्न करके विशेष गति और स्थिति प्राप्त कर सकता है, किंतु प्रतिकूल दिशा में चलकर तो संघर्ष, अशांति, कष्ट, दुःख, पराजय के सिवाय और कुछ नहीं मिलता। इससे उल्टी अपनी शक्तियाँ व्यर्थ ही नष्ट होती हैं और मनुष्य प्रगति की ओर चलकर अवनति के गर्त में गिरता जाता है, पिछड़ जाता है । शास्त्रकारों ने इसी को दैवी विधान के अनुकूल आचरण करना, "पुण्य" और इससे प्रतिकूल चलना "पाप" कहा है। इसी तथ्य को कसौटी पर परीक्षण करने वाले जीवन विद्या विशारदों ने, महापुरुषों ने कहा है कि "बुराई का परिणाम सदैव बुरा" ही होता है। दुष्कर्म, कुचिंतन दुर्भावनाओं का परिणाम सदैव दुःखदायी होता है, क्योंकि ये सब विश्व-विधान के विरोधी अनैतिक तत्व हैं ।*

    *"विवेकहीनता" और "अज्ञान" से प्रेरित मनुष्य जब विश्व प्रवाह, प्रकृति की विकास यात्रा के अनुकूल नहीं चलता, तो प्रकृति उसे एक न एक दिन ठोक-पीटकर उस ओर चलने के लिए बाध्य कर ही देती है। जब मनुष्य बाह्य आकर्षणों में अपने लक्ष्य पथ को भूल जाता है, तो उसे प्रकृति के थपेड़े खाने ही पड़ते हैं। यह निश्चित तथ्य है कि स्वार्थ, क्षणिक सुखोपभोग, समृद्धि आदि अस्थाई-क्षणभंगुर हैं । फलतः इनका पर्यावसान अनंत दुःख में ही होता है। इन्द्रिय-लोलुप व्यक्ति कई मानसिक और शारीरिक रोगों के शिकार हो जाते हैं। स्वार्थी, लोभी, लालची लोग हृदय रोग के शिकार रक्तदोष आदि से पीड़ित हो जाते हैं, साथ ही बाह्य जीवन की परिस्थितियों का गठन इस तरह हो जाता है, जिसमें विश्व-नियम के विरुद्ध चलने वाले को बार-बार ठोकरें लगती हैं, कष्टों से गुजरना पड़ता है, जनमत का, समाज का विरोध और तिरस्कार सहन करना पड़ता है। मनुष्य की समृद्धि-शक्ति, उसका वैभव-ऐश्वर्य, सुख-साधन उसे इन आंतरिक एवं बाह्य पीड़ा-झटकों से नहीं बचा सकते और बार-बार इस तरह की होने वाली शारीरिक-मानसिक पीड़ा की अनुभूति. दुःख-द्वंद्वों की प्रतिक्रिया कालांतर में मनुष्य की बुद्धि को स्थाई सुख नित्यानंद का मार्ग खोजने, उसके बारे में विचार-चिंतन करने के लिए बाध्य कर ही देती है और तब मनुष्य विश्व-नियम, देवी-विधान को समझने, सोचने और उसे जीवन में उतारने की दिशा में प्रयत्न करने लगता है। दुःख-द्वंद्वों की यह मार कष्टानुभूति की यह प्रतिक्रिया तब तक शांत नहीं होती, जब तक मनुष्य अपने जीवन के सही तथ्य को पाकर उस पर आचरण करना प्रारंभ न कर दे । इस तरह विचारपूर्वक देखा जाए तो दुःख-पीड़ा, कष्टानुभूति कोई दंड नहीं है, अपितु प्रकृति की, ईश्वरीय विधान की एक "सुधारक प्रक्रिया" है।*


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