Sunday, March 31, 2024

परमात्मा ने मनुष्य को संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनाया है

परमात्मा ने मनुष्य को संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनाया है। काम करने लायक समर्थ शरीर, सोचने-समझने के लिए विचारशील बुद्धि, एक-दूसरे से संपर्क करने तथा अपने भाव और विचार दूसरों तक पहुँचाने के लिए वाणी प्रदान की है। यदि एक-एक विशेषताओं को देखें तो संसार का कोई प्राणी उसकी तुलना का नहीं बैठता। बौद्धिक प्रतिभा के द्वारा मनुष्य ने उन्नत सभ्यता और संस्कृति का निर्माण किया-जबकि अन्य प्राणी भोजन और प्रजनन से आगे नहीं बढ़ सके। उसे जो वाणी मिली है-जिसके द्वारा वह अपने सूक्ष्म से सूक्ष्म भाव भी दूसरों तक संप्रेषित कर सकता है, वैसी क्षमता दूसरे प्राणियों में कहाँ ? ऐसी ही अगणित विशेषताएँ, विभूतियाँ मनुष्य को उपलब्ध है। वह प्रकृति की संपदा का भरपूर उपयोग कर सकता है. दूसरे प्राणियों को वैसी सुविधा नहीं है।
     इतनी विशेषताओं को देखकर लगता है कि परमात्मा ने मनुष्य के साथ पक्षपात किया है। मात्र अधिकारों को ही देखा जाए तो यही धारणा बनती है, लेकिन गहराई से विचार किया जाए तो समझ में आता है कि विशेष अधिकारों के साथ विशेष कर्तव्य भी जुड़े होते हैं। एक बैंक मैनेजर और एक चपरासी को बैंक से मिलने वाली सुविधाओं में जो अंतर है, वह उत्तरदायित्व की गंभीरता और विशेषता के कारण ही है। परमात्मा की ओर से मनुष्य को जो अतिरिक्त अनुदान मिले हैं, वह पक्षपात नहीं है और न ही अन्य जीवों के साथ अंधेर-अन्याय। उसे जो विशेष सुविधाएँ मिली हैं, वे इसलिए कि मनुष्य उनकी सहायता से अधिक काम कर सके। जिस दायित्व की पूर्ति को सरल-साध्य बनाने के लिए मनुष्य को यह सुविधाएँ मिली है, वह दायित्व है-परमात्मा के इस विश्व उद्यान को सुंदर बनाना।
      घर में पिता अपने जवान और समझदार बड़े बेटे को घर की विशेष जिम्मेदारियों सौंपता है, तो उसे दूसरों की अपेक्षा अधिक अधिकार-अनुदान भी देता है। ऐसा करना उचित भी है और आवश्यक भी। परमात्मा ने अन्य जीवों की तुलना में मनुष्य को अपना वरिष्ठ पुत्र मानकर विशेष अनुदान दिये हैं। उद्देश्य यही है कि जब वह अपने विशेष उत्तरदायित्व पूरे करने के लिए आगे आये तो उन्हें संभाल भी सके और पूरा भी कर सके

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Thursday, March 21, 2024

रिश्तों में अपनेपन का महत्त्व

रिश्तों में अपनेपन का महत्व जीवन में आवश्यक होता है जब हम अपने जीवन की यात्रा पर निकलते हैं, तो हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं हमारे आस-पास के लोग। हमारे जीवन में अपनेपन के रिश्ते हमें सहारा देते हैं, हमें आत्मविश्वास प्रदान करते हैं और हमें जीने की प्रेरणा प्रदान करते हैं। इस ब्लॉग में, हम अपनेपन के रिश्तों के महत्व को समझने का प्रयास करेंगे और उनके महत्व को समझेंगे।

अपनेपन के रिश्तों का अर्थ है किसी के साथ वह विशेष संबंध जो हमें वास्तविकता में संपूर्णता का अहसास कराता है। ये रिश्ते हमें उस अहसास से परिचित कराते हैं कि हम कितने महत्वपूर्ण हैं, कितने प्रेमी हैं और कितने समर्पित हैं।
अपनेपन के रिश्ते हमें एक-दूसरे के साथ संबंधों की गहराई में ले जाते हैं और हमें एक-दूसरे की भावनाओं को समझने और साथ ही साथ उन्हें समझाने का अवसर प्रदान करते हैं।
अपनेपन के रिश्तों का एक और महत्वपूर्ण अंग है सहयोग और समर्थन। जब हम अपनेपन के रिश्तों में शामिल होते हैं, तो हम एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करते हैं, समस्याओं का सामना करते हैं, और आपसी समर्थन और प्रेरणा प्रदान करते हैं। इस तरह के रिश्तों में, हम एक-दूसरे के साथ जीवन की सभी मुश्किलें और सुख-दुख साझा करते हैं और इसका अहसास करते हैं कि हम अकेले नहीं हैं।
 विश्वास और आत्मविश्वास का विकास मधुर रिश्ते मैनेज करने से होता है जब हम किसी के साथ एक अपनेपन का रिश्ता बनाते हैं, तो हम आत्म-समर्थन और विश्वास के भाव को सीखते हैं। हम जानते हैं कि हमारे अपने हमेशा हमारे साथ हैं, हमें समर्थन प्रदान करते हैं और हम भी उन पर पूरा विश्वास करते हैं

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Sunday, March 17, 2024

भोजन का प्रभाव

मनुष्य जीवन पर भोजन का क्रम बहुत गहराई तक पड़ता है। जितना सात्त्विक, शुद्ध एवं उपयुक्त भोजन किया जाएगा, मनुष्य का तन-मन भी उतना ही शुद्ध एवं सात्त्विक बनेगा। निम्नकोटि एवं निम्न भावनाओं से प्राप्त अन्न मनुष्य के शरीर को अस्वस्थ एवं मलिन बना देता है। "जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन" वाली कहावत से सभी परिचित हैं। अन्न उत्पादन से लेकर ग्रहण तक उसकी शुद्धता एवं स्वच्छता पर ध्यान रखने का निर्देश शास्त्रों में किया गया है, जिससे कि उससे प्राप्त होने वाले तत्त्व एवं सूक्ष्म संस्कार विकृत होकर मनुष्य के तन-मन एवं आत्मा पर कुप्रभाव न डालने पावें; उसकी प्रवृत्तियाँ पूर्ण, पवित्र एवं उपयुक्त बनी रहें; जिससे कि वह मनुष्यता के उन्नत सोपानों पर क्रम से बढ़ता चला जाए।
      परावलंबन, पराधीनता अथवा अनाचरण से प्राप्त किया हुआ अन्न तो दूषित होता ही है, किंतु "भिक्षा" से प्राप्त किया हुआ अन्न सबसे अधिक दूषित होता है; वह चाहे पैसा माँगकर खरीदा गया हो अथवा भोजन के रूप में पाया गया हो। "भिक्षा" का अन्न मनुष्य के मन, बुद्धि तथा आत्मा के लिए विष ही है। भिखारी जब किसी से कुछ माँगता है, तब उसकी आत्मा में एक दीनता, हीनता एवं ग्लानि होती है। वह स्वयं जानता है कि अपना स्वाभिमान खोकर माँग रहा है। भिखारी यदि एक बार भूखा होने पर माँगता है, तो अनेक बार झूठ बोलकर माँग लाता है। यह एक प्रकार की ठगी है, जिसके लिए न तो उसका मन प्रसन्न होता है और न बुद्धि प्रत्युत उसकी आत्मा इस निकृष्ट कार्य के लिए धिक्कार भाव ही रखती है। ऐसे धिक्कारपूर्ण अन्न से स्वस्थ तत्त्वों का मिल सकना संभव नहीं। साथ ही अनेक बार तो देने वाला भिखारी के हठ के कारण खीझकर ही उसे कुछ डाल देता है। देने वाले एवं लेने वाले, दोनों की असद् भावनाओं के प्रभाव से अन्न के सूक्ष्म संस्कार दूषित हो जाते हैं, जो झोली पर दयनीय के रूप में प्रतिफल होते हैं। यही कारण है कि ग्लानिपूर्ण अन्न खाने से भिखारी दीन- हीन एवं मलिन दीखते रहते हैं। उनका शरीर रोगी तथा मुख निस्तेज ही बना रहता है। "भिक्षा"-भोजन करने वाला, चाहे वह कितना ही पौष्टिक भोजन क्यों न पाए, किसी प्रकार से स्वस्थ नहीं रह सकता।

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Thursday, March 14, 2024

आत्म विकास

"आत्म विकास" ....आध्यात्मिक साधना का मुख्य उद्देश्य मानवता का उच्चतम स्तर प्राप्त करना ही है। मानवता की चरमावधि पर पहुँचकर मनुष्य दैवत्व की परिधि में प्रवेश करता है और वहाँ से शनैः-शनैः उठता हुआ ईश्वरीय परिधि की ओर बढ़ता जाता है। इस प्रकार ईश्वरप्राप्ति की सोपान परंपरा में मनुष्य का विकास आदि सोपान है। आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए जिज्ञासु व्यक्ति को सर्वप्रथम अपनी "मनुष्यता" का ही विकास करने का प्रयत्न करना चाहिए। जो साधक मनुष्यता का विकास न कर सीधे-सीधे ईश्वरप्राप्ति की कामना से साधनारत रहते हैं, उनको अपने उद्देश्य में सफलता मिल सकना असंभव ही समझना चाहिए।
      "मनुष्यता" के विकास का क्रम "शरीर" से चलता हुआ "आत्मा" तक पहुँचता है और तब "आत्मविश्वास" से "आध्यात्मिक" विकास की ओर मार्ग जाता है। शारीरिक विकास का तात्पर्य उसके लंबे-चौड़े, मोटे- ताजे होने से नहीं है, वरन इसका मात्र मंतव्य उसके पूर्ण आरोग्य से है।
      शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा आत्मिक विकास यों ही आप-से-आप नहीं हो जाता, उसके लिए कुछ निश्चित नियम एवं कर्तव्य हैं, जिनका सावधानीपूर्वक पालन करना होता है। इन नियमों एवं कर्त्तव्यों के क्रम को "धर्म" कहा जाता है। इस प्रकार "धर्म" का आचरण करना ही वह उपाय है, जिसके आधार पर मनुष्य आत्मविकास की ओर बढ़ता है।

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Sunday, March 10, 2024

सुखी रहने का सही तरीका

सुखी रहने का सही तरीका सही दृष्टिकोण आज का व्यक्ति समस्याओं के जाल में दिन-दिन जकड़ता चला जा रहा है। क्या धनी, क्या निर्धन, क्या विद्वान, क्या अशिक्षित, क्या रुग्ण तथा स्वस्थ सभी स्तर के मनुष्य अपने को अभावग्रस्त और संकटग्रस्त स्थिति में पाते हैं। भूखे का पेट दर्द-दूसरी तरह का और अतिभोजी का दूसरे ढंग का; पर कष्ट पीड़ित तो दोनों ही समान रूप से हैं।
        भौतिक दृष्टि से विज्ञान ने मनुष्य के लिए अगणित प्रकार की प्रचुर साधन-सुविधाएँ उपलब्ध करा दी हैं। अब से कुछ शताब्दियों- पूर्व लोग कहीं लंबी यात्रा पर निकलते थे, तो यह मानकर चलते थे कि पता नहीं अब लौटकर परिवार वालों को देख भी सकेंगे या नहीं। इसलिए वे यात्रा पर निकलते समय परिवार की व्यवस्था इस प्रकार बनाकर चलते थे, मानो अब उनकी आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। पर अब तो मनुष्य कुछ ही दिनों में चंद्रमा की यात्रा करके भी सकुशल वापस लौट आने में समर्थ है। कहने का आशय यह कि प्राचीनकाल की तुलना में आज साधन-सुविधाओं में आकाश-पाताल जितना अंतर हो गया है। इसे कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता।
      साधनों के विकास और सुविधाओं के अंबार लग जाने पर यह होना चाहिए कि मनुष्य सुखी रहता। लेकिन देखते हैं, मनुष्य पहले की तुलना में और भी ज्यादा दुःखी और संकटग्रस्त हो गया है। उसके चारों ओर समस्याओं का जाल जकड़ता जा रहा है। सभी कोटि के मनुष्य अपने को अभावग्रस्त और संकटग्रस्त स्थिति में अनुभव करते हैं। व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन और संसार के सभी क्षेत्रों में समस्याएँ ही समस्याएँ बिखरी पड़ी हैं। विभिन्न वर्ग के विभिन्न स्तर के व्यक्तियों की समस्याएँ भिन्न-भिन्न हो सकती हैं। वे एक-दूसरे से किसी रूप में संबद्ध भी नहीं लगतीं, पर उनके मूल में यदि देखा जाय तो एक ही कारण प्रतीत होगा वह है-"अनात्मवादी दृष्टिकोण।
     प्रकाश की अनुपस्थिति का नाम ही अंधकार है। जब प्रकाश बुझ जाता है तो अंधकार आ जाता है और जब प्रकाश फैलने लगता है तो अंधकार भाग जाता है। इन दिनों साधन-सुविधाओं की दृष्टि से पर्याप्त प्रगति हुई है, पर जिस आधार पर सुख-शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत किया जा सकता है, उस "दृष्टिकोण" का अभाव ही समस्याओं का कारण बना हुआ है। अंधकार को दूर भगाने के लिए कितने ही साधन जुटाए जाएँ, कितनी ही तैयारियां की जाएँ, जब तक प्रकाश फैलाने का प्रयास न किया जाय, तब तक अंधकार बना ही रहेगा। कितने ही साधन इकट्ठे कर लिए जाएँ, कितनी ही सुविधाएँ बढ़ा ली जाएँ, पर "अनात्मवादी" दृष्टिकोण को निरस्त करने के लिए जब तक "अध्यात्म" की ज्योति नहीं जगाई जायेगी, तब तक वे प्रयास व्यर्थ ही होते चले जायेंगे।

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Friday, March 8, 2024

स्वस्थ रहना है तो सक्रियता का अभ्यास करें

स्वस्थ रहना है तो सक्रियता का अभ्यास करें "मन" का स्वस्थ होना ही ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि मन स्वस्थ होगा तो दुबला-पतला शरीर भी बहुत कुछ कर सकेगा। महात्मा गाँधी में सक्रियता और फुर्तीलापन उनके स्वस्थ मन के कारण हो था। वे जब किसी भी कार्य या संकल्प पूर्ति में जुट जाते तो उन्हें आगे-पीछे की चिंता नहीं होती थी। वर्तमान क्षण और संकल्प या कार्य ही उनके समक्ष होता था। उनकी इस अविचल, शांत, गंभीर मनःस्थिति के कारण ही महान कार्य संपन्न होते रहे
       मन का ठीक-ठीक निर्माण एवं उसे स्वस्थ बनाने के लिए निम्नलिखित बातों को जीवन में अपनाना चाहिए । इससे हमारा मन स्वस्थ बनेगा और मनः शांति बढ़ेगी। जीवन में निरंतर सक्रियता की आवश्यकता है। जो जीवन अकर्मण्य है वह एक अभिशाप ही है। कहावत भी है 'खाली दिमाग शैतान का घर है। कार्यशीलता से रहित जीवन भारस्वरूप ही है। अकर्मण्य एवं आलसी व्यक्ति सदैव इस संसार में पिछड़े हैं। ऐसे व्यक्तियों को इस संघर्षमय कर्मक्षेत्र संसार में स्थान नहीं है। जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने कोई जादू या छल से महानता प्राप्त नहीं की है। उनकी महानता का एकमात्र कारण उनका निरंतर कर्तव्यपरायण बने रहना एवं निष्ठापूर्ण जीवन बिताना ही था।उनके जीवन में 'आराम हराम' था
       जीवन की निरंतर सक्रियता में उद्दंडी मन की चंचलता, संकल्प विकल्प, वासना आदि नष्ट हो जाते हैं। कार्य व्यस्त और परिश्रमी व्यक्ति धीरे-धीरे इस चंचल मन पर बाजी मार लेते हैं। मन एक अजीब भूत है जो अपनी कल्पना एवं विचारों के सहारे आकाश-पाताल और लोक- लोकांतरों में उड़ा-उड़ा फिरता है। ऐसे मन पर काबू पाना सहज नहीं होता। इस भूत को निरंतर काम में जोते रहना ही इसे बस में करने का एक मंत्र है
         जीवन में सक्रियता की इसलिए भी आवश्यकता है कि ईश्वर ने हमें क्रिया शक्ति दी है कुछ करते रहने के लिए। अतः यदि हम अकर्मण्य रहे और ईश्वरीय विधान के विपरीत चले तो यह शक्ति हमसे छीन ली जाती है। इंद्रियाँ अपनी क्रिया शक्ति को खो देती हैं। ऐसा व्यक्ति हाथ-पैर होते हुए भी मुर्दा ही है। वह जीवन में पराधीनता के सिवाय और कुछ नहीं देख सकता

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समय का चक्र और संघर्ष की कहानी

जनयुग के प्रहरी में आप पढ़े 😊 समय का चक्र और अज्ञातवास की कहानी, संघर्ष की कहानी  समय का पहिया घूमता रहता है, और हमें अपने जीवन में कई बार ...