"मनुष्यता" के विकास का क्रम "शरीर" से चलता हुआ "आत्मा" तक पहुँचता है और तब "आत्मविश्वास" से "आध्यात्मिक" विकास की ओर मार्ग जाता है। शारीरिक विकास का तात्पर्य उसके लंबे-चौड़े, मोटे- ताजे होने से नहीं है, वरन इसका मात्र मंतव्य उसके पूर्ण आरोग्य से है।
शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा आत्मिक विकास यों ही आप-से-आप नहीं हो जाता, उसके लिए कुछ निश्चित नियम एवं कर्तव्य हैं, जिनका सावधानीपूर्वक पालन करना होता है। इन नियमों एवं कर्त्तव्यों के क्रम को "धर्म" कहा जाता है। इस प्रकार "धर्म" का आचरण करना ही वह उपाय है, जिसके आधार पर मनुष्य आत्मविकास की ओर बढ़ता है।
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