परावलंबन, पराधीनता अथवा अनाचरण से प्राप्त किया हुआ अन्न तो दूषित होता ही है, किंतु "भिक्षा" से प्राप्त किया हुआ अन्न सबसे अधिक दूषित होता है; वह चाहे पैसा माँगकर खरीदा गया हो अथवा भोजन के रूप में पाया गया हो। "भिक्षा" का अन्न मनुष्य के मन, बुद्धि तथा आत्मा के लिए विष ही है। भिखारी जब किसी से कुछ माँगता है, तब उसकी आत्मा में एक दीनता, हीनता एवं ग्लानि होती है। वह स्वयं जानता है कि अपना स्वाभिमान खोकर माँग रहा है। भिखारी यदि एक बार भूखा होने पर माँगता है, तो अनेक बार झूठ बोलकर माँग लाता है। यह एक प्रकार की ठगी है, जिसके लिए न तो उसका मन प्रसन्न होता है और न बुद्धि प्रत्युत उसकी आत्मा इस निकृष्ट कार्य के लिए धिक्कार भाव ही रखती है। ऐसे धिक्कारपूर्ण अन्न से स्वस्थ तत्त्वों का मिल सकना संभव नहीं। साथ ही अनेक बार तो देने वाला भिखारी के हठ के कारण खीझकर ही उसे कुछ डाल देता है। देने वाले एवं लेने वाले, दोनों की असद् भावनाओं के प्रभाव से अन्न के सूक्ष्म संस्कार दूषित हो जाते हैं, जो झोली पर दयनीय के रूप में प्रतिफल होते हैं। यही कारण है कि ग्लानिपूर्ण अन्न खाने से भिखारी दीन- हीन एवं मलिन दीखते रहते हैं। उनका शरीर रोगी तथा मुख निस्तेज ही बना रहता है। "भिक्षा"-भोजन करने वाला, चाहे वह कितना ही पौष्टिक भोजन क्यों न पाए, किसी प्रकार से स्वस्थ नहीं रह सकता।
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