Tuesday, February 6, 2024

कठिनाईयो को अधिक न आंके

अपनी कठिनाइयों को  अधिक न आंके जीवन को शांतिपूर्ण रीति से व्यतीत करने का तरीका यह है कि हम अपनी कठिनाइयों का मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर न आँकें। वरन उतना ही समझें जितनी कि वे वास्तव में हैं इससे हमारी अनेक दुश्चिंताएँ, आसानी से नष्ट हो सकती हैं
        एक विद्यार्थी परीक्षा में अनुत्तीर्ण होता है फेल होने के समाचार से उसका मानसिक संतुलन डगमगा जाता है वह इस असफलता को वज्रपात जैसी मानता है सोचता है सारी दुनिया मुझे धिक्कारेगी, मूर्ख या आलसी समझेगी, मित्रों के सामने मेरी सारी प्रतिष्ठा धूल में मिल आएगी, अभिभावक कटु शब्द कहकर मेरा तिरस्कार करेंगे, यह कल्पना उसे असह्य लगती है, चित्त में भारी क्षोभ उत्पन्न होता है और रेल के आगे कटकर, नदी में कूदकर या और किसी प्रकार वह अपनी आत्महत्या कर लेता है, घरभर में कुहराम मच जाता है, वृद्ध माता-पिता रो-रोकर अंधे हो जाते हैं एक उल्लासपूर्ण हँसते-खेलते घर का वातावरण शोक, क्षोभ और निराशा में परिणत हो जाता है इस विपन्न स्थिति को उत्पन्न करने में सारा दोष उस गलत दृष्टिकोण का है जिसके अनुसार एक छोटी-सी असफलता को इतना बढ़ा- चढ़ाकर आंका गया
       एक दूसरा विद्यार्थी भी उसी कक्षा में अनुत्तीर्ण होता है उसे भी दुःख तो होता है, पर वह वस्तुस्थिति का सही मूल्यांकन कर लेता है और सोचता है कि इस वर्ष बोर्ड का परीक्षाफल 43 प्रतिशत ही तो रहा है, मेरे समान अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या 57 प्रतिशत है। वर्तमान परिस्थितियों में अनुत्तीर्ण होना एक साधारण-सी बात है, इसमें सदा विद्यार्थी ही दोषी नहीं होता, वरन प्राय: शिक्षकों की उदासीनता, बिना पढ़े हुए विषयों के परचे आ जाना और नंबर देने वालों की लापरवाही भी उसका कारण होती है, इस वर्ष अनुत्तीर्ण हो गए तो अगले वर्ष अधिक परिश्रम करने से अच्छी डिवीजन में उत्तीर्ण होने की आशा रहेगी, आदि बातों से अपने मन को समझा लेता है और अनुत्तीर्ण होने की खिन्नता को जल्दी ही अपने मन से हटाकर आगे के कार्यक्रम में लग जाता है
      दोनों ही छात्र एक ही समय एक ही कक्षा में अनुत्तीर्ण हुए थे एक ने आत्महत्या कर ली, दूसरे ने उस बात को मामूली मानकर अपना साधारण क्रम जारी रखा फेर केवल  समझ का था परिस्थिति का नहीं, यदि परिस्थिति का होता तो दोनों को समान दुःख होना चाहिए था और दोनों को आत्महत्या करनी चाहिए थी, पर ऐसा होता नहीं, इससे स्पष्ट है कि परिस्थितियों के मूल्यांकन में गड़बड़ी होने से मानसिक संतुलन बिगड़ा और उसी से दुर्घटना घटित हुई।

पढ़ते रहे #ब्लॉग जनयुग के प्रहरी 

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