मिथ्या चिंतन को त्यागें
आत्म - लाभ पाएँ
शरीर को भोग का साधन मानना एक अकल्याण दृष्टिकोण है, अनाध्यात्मिक भाव है। इसी के कारण ही तो आज हम सब पतन के गर्त में गिरे हुए शोक-संतापों और दुःख-क्लेशों में फंसे हुए हैं। शरीर, आध्यात्मिक साधना का एक महान् माध्यम है। इसी की सहायता से आत्मा का ज्ञान और परमात्मा का साक्षात्कार होता है। इसे संसार के अपवित्र भोगों में लिप्त कर डालना अकल्याणकर प्रमाद है, जिसे कभी भी न करना चाहिये। शरीर को भगवान का मंदिर समझकर "आत्म-संयम" तथा "अध्यात्म साधना" द्वारा श्रेय पथ पर बढ़ना चाहिये।
अनात्म भाव के कारण ही शरीर "साध्य" बना हुआ है, अन्यथा यह एक चमत्कारी "साधन" है, जिसका सदुपयोग कर इसी जीवन में आत्मा को पाया और परमात्मा का साक्षात्कार किया जा सकता है। शरीर को अपनी संपत्ति मानकर भोग-विलासों में लगाये रहना अहंकार है। वस्तुतः शरीर आत्मा की संपत्ति है, उसका ही उपादान है, अस्तु इसे ऐसे साधनों में ही लगाया जाना चाहिए, जिससे भव-बंधन में आबद्ध आत्मा मुक्त हो और जीवन शाश्वत सुख का लाभ प्राप्त हो।
भव-रोगों में फँसे मनुष्यों की इस पतितावस्था से उद्धार का एक ही मार्ग है और वह है "अध्यात्मवाद"। भौतिकवाद के उन्माद ने आज मानव जाति को उन्मत्त बना रखा है। वह कल्याण के ज्ञान से सर्वथा रिक्त होती जा रही है। आज लोगों की मनोभूमियाँ इस सीमा तक दूषित हो गई हैं कि अमंगल में मंगल दीखने लगा है। मानसिक विकारों, आवेगों, प्रलोभनों और पाप पर नियंत्रण कर सकना उनके लिए कठिन हो गया है। तनिक-सा प्रलोभन सामने आते ही पाप करने को उद्यत हो जाना, जरा-सा भय उपस्थित होते ही कर्तव्य-पथ का त्याग कर देना साधारण बात बन गई है।
चित्त की अस्थिरता और जीवन की निरुद्देश्यता ने लोगों को विक्षिप्त बना रखा है। ऐसी भयानक मनोभूमि और ऐसे पापपूर्ण व्यवहार के रहते हुए कैसे आशा की जा सकती है कि मनुष्य अपने जीवन लक्ष्य परमानंद को प्राप्त कर सकता है। इन सब विकारों और विपरीतताओं का एकमात्र कारण है- "अध्यात्मवाद" की उपेक्षा। यदि "संसार" के साथ "आत्मा" का भी ध्यान रखा जाये, उसके विकास और मुक्ति का प्रयत्न करते रहा जाये तो शीघ्र ही इन सारे भव-रोगों से मुक्त होकर मनुष्य आनंद की ओर अग्रसर हो चले। "आत्म-लाभ" ही सर्वश्रेष्ठ लाभ माना गया का है, उसी को प्राप्त करना श्रेय है और उसी को पाने के लिए प्रयत्न भी किया जाना चाहिए।
पढ़ते रहे ब्लॉग #जनयुग के प्रहरी
No comments:
Post a Comment