Saturday, December 23, 2023

कठिनाइयां हमे सचेत करती हैं

कठिनाइयां हमें सचेत करने जीवन में आती हैं

           बबूल के बीज बोने पर काँटेदार वृक्ष का पैदा होना निश्चित है। किसी भी तरह का अनैतिक बुरा कार्य करने पर शारीरिक अवज्ञा, मानसिक रोग या किसी बाह्य दंड विपत्ति का सामना करना पड़े तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। नियतिचक्र, नैतिक मर्यादाओं के विरुद्ध आचरण करने पर मनुष्य का मनोबल क्षीण हो जाता है। कई तरह के कुविचार, कुकल्पनाएँ, उसके मन में घुस जाती हैं जिनसे बाह्य जीवन भी प्रभावित होता है और उसके फलस्वरूप कई दुष्परिणाम मिलते हैं। मानसिक द्वंद्वों में मनुष्य घुल-घुलकर विनाश को प्राप्त होने लगता है। अनैतिक आचरण से मनुष्य का विवेक, नैतिक बुद्धि प्रबल नहीं होती और उसे उचित-अनुचित का भी ध्यान नहीं रहता। फलस्वरूप गलत निर्णय होते हैं और इससे मनुष्य भयंकर दुःखद परिस्थितियों में पड़ जाता है।

       इसका यह भी अर्थ नहीं कि विश्वनियामक विधान की मर्यादा तोड़ने वाले मनुष्यों से कोई दुश्मनी हो। यह सुधारात्मक संतुलन पैदा करने वाला तत्त्व है। जिस तरह किसी रोग के बाह्य लक्षण उस रोग को प्रकृति द्वारा शरीर से बाहर निकालने का प्रयत्न है, उसी तरह नियतिचक्र के विरुद्ध आचरण करने से मिलने वाला शारीरिक या मानसिक दंड अनैतिक कार्य करने वाले को उस ओर से विरत करने के लिए ही एक प्रयत्न है। अभिमानी, दुराचारी अपनी असहाय दीन अवस्था में अपने अनैतिक कार्यों के लिए बहुत पश्चात्ताप करते हैं। नियति की ठोकर खाकर ही मनुष्य को कुछ होश आता है और वह अपने दुष्कर्मों के बारे में समझने  लगता है। भविष्य में ऐसा न करने का संकल्प भी करता है। खासकर परेशानी की स्थिति में तो वह दुष्कर्म नहीं ही करता। ऐसी स्थिति में कई सुधार भी किए जाते हैं, अनैतिक कार्य छोड़ देते हैं। विश्वनियामक सत्ता का अनुभव करने लगते हैं और उन्हें यह सोचने को बाध्य होना पड़ता है कि कोई सत्ता हमसे भी प्रबल है जो हमारे कर्मों का लेखा-जोखा लेती है। इतिहास साक्षी है कि जब नियति की ठोकर लगी, विश्व-विधान के अनुसार प्रतिक्रिया पैदा हुई, तो बड़े-बड़े महारथी, दिग्गज बलवानों को यह सोचने के लिए मजबूर होना पड़ा कि कोई हमसे भी शक्तिशाली सत्ता है जो हमारा लेखा-जोखा लेती है। उनका गर्व काफूर हो गया।

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