Monday, December 18, 2023

अध्यात्मवादी बनो



  हमारा दृष्टिकोण अध्यात्मवादी बने

        कितना ही "धन" कमा लिया जाए, कितनी ही "विद्या" प्राप्त कर ली जाय, कितनी ही "शक्त्ति" संचय कर ली जाए तब भी संसार के दुःखों से सर्वथा मुक्ति नहीं पायी जा सकती। धन अभावों, आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। विद्या, बौद्धिक विकास कर सकती है और शक्ति से किन्हीं दूसरों को वश में किया जा सकता है, किंतु इस प्रकार की कोई सफलता दुःखों से मुक्ति नहीं दिला सकती। धनवानों को दुःख होता है,विद्वान् शोक मनाते देखे जाते हैं और शक्तिमानों को पराजित होते देखा गया है।
         धन हो और विद्या न हो तो जड़ता से मिलकर धन विनाश का हेतु बन जाता है। विद्या हो पर स्वास्थ्य न हो तो विद्या का कोई  समुचित उपयोग संभव नहीं। दिन-रात स्वास्थ्य की चिंता लगी रहेगी। थोड़ा काम किया नहीं कि कभी सिर दर्द है तो कभी अजीर्ण हो गया, कभी सर्दी है तो कभी ज्वर घेर रहा है। इस प्रकार न जाने कितनी बाधायें और व्याधायें लगी रहती हैं। केवल विद्या के बल पर उनसे छुटकारा नहीं मिल पाता। इस प्रकार शक्ति तो हो पर धन और विद्या न हो तब भी पग-पग पर संकट खड़े रहते हैं। धन के अभाव में शक्त्ति निष्क्रिय रह जाती है और यदि उसके बल पर धन संचय भी कर लिया जाये तो विद्या के अभाव में उसका कोई समुचित उपयोग नहीं किया जा सकता।
        विद्यारहित शक्ति भयानक होती है। मनुष्य को आततायी, अन्यायी और अत्याचारी बना देती है। ऐसी अवस्था में संकटों का पारावार नहीं रहता। धन, विद्या और शक्ति तीनों वस्तुयें संसार में किसी को कदाचित् ही मिलती है।
        यदि एक बार यह तीनों वस्तुयें किसी को मिल भी जाएँ तो हानि-लाभ, वियोग-विछोह, ईर्ष्या-द्वेष आदि के न जाने कितने कारण मनुष्य को दुखी और उद्विग्न करते रहते हैं। ऐसा नहीं हो पाता कि धन, विद्या और शक्ति को पाकर भी मनुष्य सदा सुखी, संतुष्ट एवं शात बना रहे। संसार की कोई भी ऐसी उपलब्धि नहीं, जिसके मिल जाने से मनुष्य दुख-क्लेशों की ओर से सर्वथा निश्चित हो जाये
        मनुष्य जीवन का लक्ष्य "आनंद" की प्राप्ति ही है। उसी को पाने के लिए सारे प्रयत्न किये जाते हैं। भौतिक विभूतियों की सहायता से वह मिल नहीं पाता। मनुष्य दुःखी तथा उद्विग्न बना रहता है। तब कौन-सा उपाय हो सकता है, जिसके आधार पर इस असफलता को सफलता में बदला जा सके ? उसका एकमात्र उपाय यदि कोई है तो वह है 'अध्यात्म'। "अध्यात्म" की महिमा अपार है। उसके द्वारा प्राप्त होने वाले अहेतुक सुख की तुलना संसार की किसी भी विभूति से मिलने वाले क्षणिक सुख से नहीं की जा सकती। मानव-জীবন की सर्वोत्कृष्ट विभूति वही है। उसकी सहायता से मनुष्य देवताओं की भाँति सदा आनंदित रह सकता है।देवत्व प्राप्त हो जाने पर दु:ख की संभावना ही समाप्त हो जाती है।

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