भीतरी दुनिया में गुप्त-चित्र, या चित्रगुप्त पुलिस और अदालत महकमों का काम स्वयं ही करता है। बाहरी दुनियाँ में तो यदि पुलिस झूठा सबूत दे दे तो अदालत का फैसला भी अनुचित हो सकता हैं, परन्तु भीतरी दुनियाँ में ऐसी गड़बड़ी की संभावना नहीं अन्तःकरण सब कुछ जानता है कि यह कर्म किस विचार से, किस इच्छा से, किस परिस्थिति में, क्यों कर किया गया था वहाँ बाहरी मन को सफाई या बयान देने की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि गुप्त मन उस बात के संबंध में स्वयं ही पूरी-पूरी जानकारी रखता है। हम जिस "इच्छा" से, जिस "भावना" से जो काम करते हैं उस "इच्छा" या "भावना" से ही पाप-पुण्य का नाप होता है
भौतिक वस्तुओं की तौल नाप बाहरी दुनियाँ में होती है। एक गरीब आदमी दो पैसा दान करता है और एक धनी आदमी दस हजार रुपया दान करता है बाहरी दुनियाँ तो पुण्य की तौल रुपये-पैसों की गिनती के अनुसार करेगी दो पैसा दान करने वाले की ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देखेगा, पर दस हजार रुपया देने वाले की प्रशंसा चारों ओर फैल जायेगी। भीतरी दुनियाँ में यह तौल-नाप नहीं चलती बाहर की दुनियाँ में रुपयों की गिनती से, काम के बाहरी फैलाव से, कथा-वार्ता से, तीर्थयात्रा आदि भौतिक चीजों से यश खरीदा जाता है, पर चित्र गुप्त देवता के देश में यह सिक्का ही नहीं चलता, वहाँ तो इच्छा और भावना की नाप-तौल है उसी के मुताबिक पाप-पुण्य का जमा- खर्च किया जाता है भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उकसा कर लाखों आदमियों को महाभारत के युद्ध में मरवा डाला लाशों से भूमि पट गई, खून की नदियाँ बह गई फिर भी अर्जुन को कोई पाप नहीं लगा अर्जुन का उद्देश्य पवित्र था, वह पाप को नष्ट करके धर्म की स्थापना करना चाहता था बस वही इच्छा खुफिया रजिस्टर में दर्ज हो गई आदमियों के मरने जीने की संख्या का कोई हिसाब नहीं लिखा गया। दुनियाँ में करोड़पति की बड़ी प्रतिष्ठा है, पर यदि उसका दिल खोटा है तों चित्रगुप्त के दरबार में भिखमंगा शुमार किया जायगा। दुनियाँ का भिखमंगा यदि दिल का धनी है तो उसे बादशाह गिना जायगा इस प्रकार मनुष्य जो भी काम कर रहा है वह किस नीयत से कर रहा है, वह नीयत, भलाई या बुराई, जिस दर्जे में जाती होगी उसी में दर्ज कर ली जायगी सद्भाव से फाँसी लगाने वाला एक जल्लाद भी पुण्यात्मा गिना जा सकता है और एक धर्मध्वजी तिलकधारी पण्डित भी गुप्त रूप से दुराचार करने पर पापी माना जा सकता है बाहरी आडम्बर का कुछ मूल्य नहीं है, कीमत भीतरी चीज की है सीप की कुछ कीमत नहीं, मोल-तोल तो मोती का है। बाहर से कोई काम भला या बुरा दिखाई दे, तो उससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। असली तत्व तो उस "इच्छा" और "भावना" में है, जिससे प्रेरित होकर वह काम किया गया है पाप-पुण्य की जड़ कार्य और प्रदर्शन में नहीं, वरन् निश्चित रूप से "इच्छा" और "भावना" में ही है।
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