जिस समाज का इतना उपकार और अनुदान लेकर मनुष्य सुख-सुविधाएँ प्राप्त करता है, उसका वह ऋणी है। इस ऋण को चुकाना कृतज्ञता की, प्रत्युपकार की और सामाजिक श्रृंखला की परंपरा बनाये रखने की दृष्टि से नितांत आवश्यक है। यदि लोग समाज के कोष से लेते तो रहें, पर उसका भंडार भरने की बात न सोचें, तो वह सामूहिक कोष खाली हो जायगा। समाज खोखला और दुर्बल हो जाएगा, उसमें व्यक्तियों की सुविधा बढ़ाने एवं सहायता करने की क्षमता न रहेगी, फलतः मानवीय प्रगति का पथ अवरुद्ध हो जायगा। "प्राप्त तो करें पर लौटायें नहीं" की नीति अपना ली जाए तो बैंक दिवालिये हो जायेंगे, सरकार खोखली हो जायगी, जमीन का उपार्जन बंद हो जायेगा, व्यापार की श्रृंखला ही बिगड़ जायेगी। इस संसार में 'लो और दो' की नीति पर सारी व्यवस्था चल रही है। 'लो' के लिए तैयार- 'दो' के लिए इनकार की परंपरा यदि चल पड़े तो सारा क्रम ही उलट जायगा, तब हमें असामाजिक आदिम युग की ओर वापस लौटना पड़ेगा।
आधा भाग मनुष्य की बुद्धि और श्रमशीलता का और आधा भाग सामाजिक अनुदान का माना गया है। तदनुसार तत्त्वदर्शियों ने यह व्यवस्था बनाई है कि उसे अपनी जीवन संपदा का आधा भाग अपनी शरीर यात्रा के लिए रखना चाहिए और आधा सामाजिक उत्कर्ष के लिए लगा देना चाहिए। दूसरे शब्दों में इसे "सेवा धर्म" की प्रेरणा भी कहा जा सकता है। मनुष्य को ईश्वर ने इतनी विभूतियाँ दीं, इतने विशेष अधिकार दिये, उनके साथ जुड़े हुए दायित्वों की पूर्ति"सेवा धर्म" अंगीकार करने से ही संभव है। समाज का जो इतना भारी ऋण उसके ऊपर है, उससे आंशिक मुक्ति "सेवा धर्म"अपनाने से प्राप्त की जा सकती है।
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