सत्य में हजार हाथियों का बल क्योंकि सत्य में हजार हाथियों का बल होता है, "सत्य" की महिमा अपार है। शास्त्रों और ऋषियों ने उसे धर्म और अध्यात्म का आधार माना है और कहा है- "सत्यमेव जयते नानृतम्" अर्थात् "सत्य ही जीतता है, असत्य नहीं।" चिरस्थायी सफलताओं का आधार सत्य पर रखा गया है। असत्य के सहारे कोई व्यक्ति थोड़े समय तक लाभ प्राप्त कर सकता है, पर जब वस्तुस्थिति प्रकट हो जाती है, तब उस लाभ को समाप्त होते हुए भी देर नहीं लगती। "सत्य" का वट वृक्ष धीरे-धीरे भले ही बढ़ता और फैलता-फूलता हो, पर जब वह परिपुष्ट हो जाता है. तब उसका आयुष्य हजारों वर्षों का बन जाता है। वट वृक्ष की जड़ें नीचे जमीन में भी चलती हैं और ऊपर की शाखाओं में से भी निकलकर नीचे आती हैं और जमीन में प्रवेश कर वृक्ष की पुष्टि और आयु बढ़ाने में सहायक होती हैं। दूसरे छोटे पेड़-पौधे प्रकृति के प्रवाह को देर तक नहीं सह पाते और शीघ्र ही बूढ़े होकर अपना अस्तित्व खो बैठते हैं। "सत्य" वट वृक्ष के समान है, अन्य आधारों पर प्राप्त की गई सफलताएँ बरसाती घास-पात की तरह हैं, जो "सत्य" के सूर्य की प्रखरता सहन कर सकने में समर्थ नहीं होती ग्रीष्म ऋतु में उनका अस्तित्व अक्षुण्ण नहीं रह सकता।*
*उक्ति है कि "सत्य में हजार हाथियों के बराबर बल होता है।" शारीरिक दृष्टि से यह बात सच भले ही न हो, पर आत्मिक दृष्टि से पूर्णतया सही है। "सत्यनिष्ठ" व्यक्ति में इतना "आत्मबल" होता है कि वह अकेला हजार मिथ्याचारियों से भिड़ सकता है और अंततः वही विजय प्राप्त करता है। जहाँ सत्य है, वहाँ अन्य गुण अपने आप उत्पन्न हो जाते हैं। जहाँ असत्य है, वहाँ दुर्गुणों का भंडार धीरे-धीरे भरता और बढ़ता चला जाता है। इसलिए "आत्मबल" बढ़ाने के लिए, ईश्वर प्राप्त करने के लिए हमारे शास्त्रों में "सत्यनिष्ठा" को महानतम उपासना बताया है। भारतीय धर्म में सत्य को परमात्मा का स्वरूप माना है। सत्य को नारायण कहा गया है, "सत्य-नारायण" भगवान् की 'जय बोलने, कथा सुनने, व्रत रखने का अपने यहाँ चिर-प्रचलन है। यह सत्य-नारायण कोई व्यक्ति या देवता नहीं है वरन् सच्चाई को अंतःकरण, मस्तिष्क और व्यवहार में प्रतिष्ठापित करने की प्रगाढ़ आस्था ही है। जो सत्यनिष्ठ है, वही सत्य-नारायण भगवान का समीपवर्ती साधक है। *स्वर्ग और मुक्ति-सिद्धि एवं समृद्धि तो उसके करतलगत ही रहती है।*
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