वास्तव में जिसे हम भगवान कहते हैं, वही मनुष्य के भीतर स्थित आत्मबल है। जब यह आत्मबल जाग्रत हो जाता है, तब असंभव भी संभव बन जाता है। ईश्वर बाहर नहीं, हमारे मन और विचारों में निवास करता है।
आत्मबल बढ़ाने के अनेक मार्ग हैं। कोई भक्ति, जप, ध्यान और पूजा से इसे सशक्त करता है, तो कोई परिश्रम, साहस, अनुशासन और आत्मविश्वास से। संसार में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जहाँ बिना धार्मिक साधना के भी लोगों ने महान उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। यह सिद्ध करता है कि विश्वास और प्रयास ही आत्मबल की असली शक्ति हैं।
ईश्वर का नियम समान है। जैसे अग्नि अपने नियम से जलाती है, वैसे ही आत्मबल भी कर्म के अनुसार फल देता है। श्रद्धा रहित पूजा निष्फल होती है, जबकि दृढ़ विश्वास से किया गया छोटा प्रयास भी बड़े परिणाम देता है।
महापुरुषों की सफलता किसी चमत्कार का परिणाम नहीं, बल्कि उनके अडिग मनोबल की देन थी। जब मन मजबूत होता है, तो अवसर स्वयं रास्ता खोज लेते हैं। धन, यश और सौभाग्य उसी दिशा में आते हैं, जिस दिशा में मन की शक्ति बहती है।
इसलिए कहा गया है— भगवान एक कल्पवृक्ष हैं। मनुष्य जैसी भावना और प्रयास करता है, वैसा ही फल पाता है। वास्तव में ईश्वर को पाना है, तो अपने आत्मबल को पहचानना होगा।
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