बेटे बेटियों का लालन पालन और समानता के अधिकार के साथ शिक्षा के साथ संस्कार एवम् संस्कृति का ज्ञान देना एक माता पिता एवम् परिवार को भी साथ में बहुत से विषयों पर संयमित जीवन जीना होता है तथा जिस घर में बिटिया पल रही होती हैं वहां हमारी संस्कृति के माहौल में रहना सबके लिए आवश्यक होता है क्योंकी आजकल के चल रहे ट्रेंड जिसमें असीमित और अनावश्यक आवश्यकताओं के बिच जी रहा है समाज ... जिसमें सीमित साधनों की उपयोगिता को समझाना एक बाप के लिए बेटी की परवरिश कितनी चुनौती पूर्ण होगी यह किसी बड़े अनुष्ठान से कम नहीं बावजूद इसके बेटी के ससुराल वाले पाखंडी निकल जाएं तो कितनी दुःखद बात होगी इसका अंदाज सिर्फ संस्कारमय जीवन शैली के साथ त्याग और तपस्या करने वाले को ही होगा अन्य किसी को नहीं, जिस घर में बेटी नहीं होती उसको तो इसका अंदाज कम होता है लेकिन बहुत बार ऐसा होने पर भी वो भूल जाते हैं कि बहु बेटी का रूप होती हैं जब बेटे और बेटी में फर्क भी नहीं समझना और साथ ही संतानों को आवश्यक आजादी के साथ संस्कार पाना संतानों के लिए भी उस समय सहज होगा जब हमने ऐसे वातावरण का निर्माण किया होगा अन्यथा आधुनिकता मार्ग भटकाव में देरी नहीं करेगा अतः रिश्ते उसी घर में करे जहा संस्कार हो, संस्कृति का भान हो, समधी जीवन पर्यन्त रिश्ते की गरिमा को समझता रहे और बहू में बेटी का रुप देखें अन्यथा हमारे समधी का चुनाव पश्चाताप की आग में जलाता रहेगा।।
पढ़ते रहे ब्लॉग जनयुग के प्रहरी
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