हमारी संस्कृति हमारे विरासत की धरोहर है, हम इसे संजोए रखें और भावी जीवन को संस्कारमय बनाकर वातावरण में महकता दे यह हमारे चित्त के उत्पन्न विचारों पर निर्भर करेगा, हमारी शिक्षा का स्तर जितना महत्वपूर्ण हैं उतना ही महत्वपूर्ण हमारे संस्कार हैं,यदि जीवन में दुःख ही दुःख है,कोई आनन्द नहीं है,तो समझो जीवन की दिशा गलत है दुःख कोई दे नहीं रहा है, दुःख का कारण हम स्वयं है, हमारे जीने का ढंग ठीक नहीं है, हमारी त्रुटि को ढूंढने का प्रयास करें हम जीवन के विपरीत दिशा में यात्रा कर रहे हैं, हमारी संस्कृति को हम भूल रहे हैं रास्ता भटक रहे हैं, हमारे सारे कृत्य हमारे स्वभाव के अनुकूल नहीं है, अपितु प्रतिकूल है, इसलिए दुःखी है जिस दिन हम जीवन की सुनेंगे और वहाँ से जीवन को सही दिशा प्रदान करेंगे उसी क्षण आनन्द ही आनन्द महसूस होगा इसलिए अनुभूति में हमेशा सुख का अहसास करने के लिए अपने निर्णय को बार बार न बदले, निर्णय लेने से पहले चिंतन ,मनन करें परिणाम आने तक इंतजार करना चाहिए अन्यथा अनुभवों की दुनियां में बिखराव आने लगेगा एवं जीवन में मधुरता का आभास कम होगा अतः स्वयं के कारण को समझना होगा तभी जीवन सुखद एवं समृद्ध बनेगा।।
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