मन की माया के जंजाल में फंसा हुआ है जीव।
सुख की चाह के जाल में फंसा हुआ है जीव।।
'समझ' रूपी 'गुरु' ही मुक्त कराएगा मन -माया से।
असंतोष अतृप्ति के बवाल में फंसा हुआ है जीव।।
भोग सम्पन्नता धन सम्मान आत्मा को नहीं चाहिये।
मृग तृष्णा के अनंत कमाल में फंसा हुआ है जीव।।
मन से मित्रता भली न दुश्मनी दोनों में जीव की हार।
अपने ही हाथों होता हलाल में फंसा हुआ है जीव।।
डॉ प्रेमदान चारण
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