शिक्षा एवं संस्कार दोनो अलग शब्द होते हैं जो दोनों हमें शिक्षक द्वारा प्राप्त होता हैं, बच्चों का विद्यालय जाकर केवल पाठ्यक्रम पढ़ना ही शिक्षा प्राप्त करना नही है पाठ्यक्रम तो एक माध्यम होता हैं शिक्षक द्वारा विद्यार्थियों में पाठ्यक्रम के माध्यम से उसके अंदर छिपी चेतना को जागृत करना ही सच्ची शिक्षा हैं और उस चेतना से संस्कारों को जोड़ना ही हमारी संस्कृति हैं, आधुनिक युग में अधिकांश रटन विद्या से पाठ्यक्रम तैयार करने का रट्टा लगा हुआ है जहाँ हमें वास्तविक शिक्षा का बोध नही हो पाता हैं वास्तविक शिक्षा तो संस्कारो के साथ हमारी संस्कृति का भान होना है इसके लिए हमारे आस पास का वातावरण अधिक जिम्मेदार होता हैं कि हम किस वातावरण में रह रहे हैं या हमे कैसा वातावरण मिल रहा है वातावरण के माध्यम से विद्यार्थियों का मानसिक विकास होता हैं और सही दिशा का निर्धारण होता हैं, आत्म चिंतन अच्छे माहौल से पैदा होता हैं और नया निर्माण भी उसी दिशा में कार्य करने से होता हैं जहां से इनोवेशन व खोज का उदगम होता हैं, जन्म के साथ कोई सीखकर नही आते जन्म के बाद में सब कुछ सिख मिलने लगती हैं अतीत ने भी हमें यही सिखाया है कि जन्म से कुछ वातावरण मनुष्य को एक ऐसी दिशा प्रदान कर देता हैं जहां नई खोज उत्पन्न होने लगती हैं यह उनकी क्षमताओं को समृद्ध एवं शक्तिशाली बनाने का कार्य अंतर्मन ही करता हैं लेकिन उस सम्पन्नता की जागृति लाने का प्रथम कार्य उनकी शिक्षा एवं संस्कार के साथ स्वयं की लगन से प्रतिभा निखरती हैं ।।क्रमशः।।
हमारे ब्लॉग जनयुग के प्रहरी "जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरणा और सकारत्मक भाव के आधार पर ब्लॉग में आप जीवन के हर पहलू पर आधारित लेख पढ़ सकते हैं, जैसे कि प्रेरणा, स्वास्थ्य, व्यक्तिगत विकास, जैविक खेती संबधित जानकारी और जीवन के अनुभव। हमारा उद्देश्य आपको संघर्ष के साथ आगे बढ़ना और जीवन में नई दृष्टि प्रदान करना है और आपको अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करना है।" धन्यवाद
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